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नश्वर काया – दूजराम साहू अनन्य

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Kavita Bahar || कविता बहार
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नश्वर काया – दूजराम साहू “अनन्य “

कर स्नान सज संवरकर ,
पीहर को निकलते देखा ।


नूतन वसन किये धारण ,
सुमन सना महकते देखा ।
कुमकुम चंदन अबीर लगा ,
कांधो पर चढ़ते देखा ।


कम नहीं सोहरत खजाना ,
पर खाली हाथ जाते देखा ।
गुमान था जिस तन का ,
कब्र में उसे जाते देखा ।


कर जतन पाला था जिस को,
उसकों चिता पर चढ़ते देखा ।
स्वर्ण जैसे काया को ,
धूँ-धूँ कर जलते देखा ।

दूजराम साहू “अनन्य “

निवास -भरदाकला(खैरागढ़)
जिला – राजनांदगाँव (छ.ग.)

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3 Comments
  1. Shruti says

    Bahut hi sundar…👏👏👏

  2. महदीप जंघेल says

    बहुत बढ़िया साहू जी

  3. मनीभाई नवरत्न says

    शरीर की नश्वरता पर बेहद सुंदर कविता