KAVITA BAHAR
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नूतन दीपावली

पारंपरिक कलाओ का सम्मान कर स्वदेशी चीजों को खरीदें

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नूतन दीपावली


सत्तर पार का एक जोड़ा,
पुश्तैनी कला से जुडा ।

मिट्टी के गोले को आकार देता,

कांपते हाथों से चाक को थामता,

दियों को सजाकर जामा पहनाता,
देखकर अपनी कला को मुसकाता,

जगमग दीपावली के सपने संजोता,
दियों से जगमगाते हमारे घर ऑगन,
तभी बनता उनके चूल्हों में भोजन,
हम कहते दिवाली आई,दिवाली आई,
पीड़ा देखो उनकी, जिसने _
हमारे घर रोशनी फैलाई।

करो न तुम उनसे मोल भाव,
इनके जीवन में है कितने अभाव?

तुम इनके घर ऑगन रोशनी फैलाओ ,
अपने को कृतार्थ बनाओ।

माला पहल ‘मुंबई ‘

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