विघटन पर कविता

विघटन पर कविता

विघटन की चलती क्रिया , मत होना हैरान ।
नियम सतत् प्रारंभ है , शायद सब अंजान ।।
शायद सब अंजान , बदलते  गौर करो तुम ।
आज अभी जो प्राप्त , रहे कल होकर ही गुम ।।
कह ननकी कवि तुच्छ , चिन्ह रहते हैं उपटन ।
कर जाता है काम , समय पर आकर विघटन ।।

विघटन की ये नीतियाँ , विद्यमान हर काल ।
तभी नये प्रारूप ले  ,आता है बैताल ।।
आता है बैताल , योजना मन पर गढ़ता ।
क्रियाशील इंसान , इशारे खूब समझता ।।
कह ननकी कवि तुच्छ , फँसे मत तेरी अचकन ।
दुनिया चक्करदार , हो रहा प्रतिपल विघटन ।।

विघटन से डरना नहीं , स्वागत कर सानंद ।
सदा भलाई है छुपी , खिड़की रख मत बंद ।।
खिड़की रख मत बंद , ताजगी को आने दे ।
गया समय कर नष्ट , नया कुछ सिरझाने दे ।।
कह ननकी कवि तुच्छ , दूर होंगे सब अड़चन ।
नये सृजन संकल्प , दे चला देखो विघटन ।।

                —- रामनाथ साहू ” ननकी “
                               मुरलीडीह

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