KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

ओ सजनी चली आ मेरे द्वार

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ओ सजनी चली आ मेरे द्वार


मेघ ने गाई है मल्हार ,

सावन की आई है बहार।

रह ना जाये अधूरा मेरा प्यार,
ओ सजनी, चली आ चली आ मेरे द्वार।

कोयल कूके , मन हिलोरे खाये जाये।

बार बार राह निहारुं, अब तो आ जाये।
खबर लूं तेरे, अब तो दरस दें एक बार।
ओ सजनी, चली आ चली आ मेरे द्वार।

बसंत ने मारी पिचकारी, लगा प्रेम का रंग।

चाल मेरी मतवाली हुई, पी गया कैसा भंग।
छोड़ दूं मैं रीत जग की, तोड़ सारी दीवार।
ओ सजनी, चली आ चली आ मेरे द्वार।