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परीक्षा हॉल – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

इस रचना के माध्यम से कवि परीक्षा हॉल में बैठे परिक्षार्थियों की मानसिक स्थिति की कल्पना को साकार करना चाहता है |
परीक्षा हॉल – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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परीक्षा हॉल – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

परिक्षा कक्ष में बैठे बच्चे
मन ही मन
कुछ सोच रहे हैं
कैसा होगा प्रश्नपत्र
होंगे कैसे उसमे प्रश्न

क्या – क्या पूछ बैठेंगे
क्या मैंने जो पढ़ा
हुआ है
वही परीक्षा में आयेगा
या फिर
मैं
बाजू वाले से कुछ पूछूँगा
क्या वो मेरी मदद करेगा
इस प्रश्नजाल में
उलझे बच्चे जाने
क्या – क्या सोच रहे हैं
परीक्षा हॉल में
बैठे शिक्षक के मन को
टटोल रहे हैं
क्या आज मैं
खुशी – खुशी लौटूंगा
या फिर लटके मुह
ही जाना होगा


पापा डाटेंगे मम्मी मारेगी
यह सब मुझको सहना होगा
बजी घंटी तब भ्रम टूटा
प्रश्नपत्र जब आया टेबल पर
प्रथम पृष्ठ जब मैंने देखा
मन को मेरे राहत आई
फ़टाफ़ट
फिर कलम लेकर
मैंने दौड़ लगाईं
कर डाले फिर
प्रथम पृष्ठ के सारे प्रश्न
आई अब दूसरे पृष्ठ की बारी
दूसरे पृष्ठ की मत पूछो भैया
लगती डूबती नैया
कुछ प्रश्न सर से नीचे
तो कुछ प्रश्न सर से ऊपर
खींचतान कर दिमाग लगाकर
जुगत बनाई
सोचा गाड़ी चल पड़ेगी
तभी पृष्ठ तीन
जो आया
यह मेरे मन को ना भाया
प्रश्न सभी थे विकराल
लगते थे जैसे काल
लगा फाड़ दूं पेपर को
फिर मन को कुछ कंट्रोल किया
कुछ दम मारी कुछ प्रयास किया
तब जाकर खुद पर विश्वास किया
किसी तरह जान मैं पाया
ये है शिक्षक की माया
पढ़ना तो हमको ही होगा
परीक्षा में लिखना तो
हमको ही होगा


सुननी होगी शिक्षकों की बातें
मन में उन्हें उतारना होगा
चलिए अब आई
रिजल्ट की बारी
सासें मेरी भारी-भारी
धड़कन धक् – धक्
धक् – धक्
सासें बोले
झक – झक
झक – झक
शिक्षक ने जब रिजल्ट सुनाया
मेरी समझ में


सब कुछ आया
बनना है उत्तम
तो प्रयास भी उच्च स्तर
के करने होंगे
पल –पल का
सदुपयोग करके ही
उस स्तर पर पहुचेंगे
मम्मी-पापा व अच्छे दोस्तों की
बातें सुननी होंगी
और माननी होंगी
समय व्यर्थ न गंवाना होगा
मंजिल पर पहुँचने के लिए
शोर्टकट को छोड़
परिश्रम यानी मेहनत
को अपनाना होगा
परिश्रम यानी मेहनत
को अपनाना होगा

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