KAVITA BAHAR
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नवगीत- पंथ तितली का निहारे

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नवगीत-पंथ तितली का निहारे

शांत सागर सा हृदय ले
मेघ बैठा नद किनारे।
छंद मन में गुन गुना कर
उम्र सावन की विचारे।।

ले कुहासा भोर जगती
धुंध की चादर लपेटे
मेघ धरती पर उतर कर
साँझ की शैय्या समेटे

बाग की आशा सुलगती
भृंग का पथ रथ सँवारे।
शांत………………..।।

शीत में सावन सरसता
प्रीत की बदरी लुभाए
आग हिय में भर सके वह
पुष्प ही नव गंध लाए

बिजलियों की आस लेकर
चंद्र भी भूला सितारे।
शांत………………।।

नाव बिन माँझी सरकती
रेत की पगडंडियों में
नेह की पतवार बिकती
आसमानी मंडियों में

गीत सुन सुन कर हवाएँ
आँधियों का रूप धारे।
शांंत………………..।।

प्यास से व्याकुल हुआ घन
ओस सुमनो को टटोले
आस भँवरे में जगी है
गीत गा कर मन सतोले

फूल का मन डोल जाता
पंथ तितली का निहारे।
शांत सागर सा हृदय ले
मेघ ..बैठा नद किनारे।।

✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा- भवन ३०३३२६
सिकंदरा, जिला-दौसा

राजस्थान ९७८२९२४४७९

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