KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

पावस पर कविता

0 666

पावस पर कविता

पावस पनघट आज छलक रहा है।
झर    रहा    नीर        बूँद  –  बूँद,
प्रिय  स्मृति  से  मन    भींग रहा है।

मैं  विरहिणी             प्रिय-प्रवासी,
घन  पावस         तम-पूरित  रात।
झूम-झूम   घन    बरस      रहे हैं,
अलस – अनिद्रित  सिहरता गात।
किसे  बताऊं         विरह-वेदना,
सुख निद्रा से   जग रंग   रहा   है।

झर    रहा    नीर        बूँद  –  बूँद,
प्रिय  स्मृति  से  मन    भींग रहा है।

झरती बूंदें,           तपता   तन है,
विरह- विगलित   व्यथित मन है।
चपला  चंचला      घन   गर्जन है,
स्मृति-रंजित      उर स्पंदन   है।
किसे दिखाऊँ      विकल चेतना,
चेतन  विश्व तो    ऊंघ   रहा  है।

झर रहा नीर          बूँद –  बूँद,
प्रिय स्मृति से   मन  भींग रहा है।

साधना मिश्रा,   रायगढ़-छत्तीसगढ़

Leave a comment