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पेड़ भाई पर कविता -डॉ दिलीप गुप्ता

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पेड़ भाई पर कविता

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धरती में जन्मे ….आदमी
धरती में उगे ….पेड़
सगे भाई हुए न…..!

धरती ने माँ का फर्ज निभाया…
पेड़ों ने भी न रखा बकाया…
पर आदमी..औकात पर उतार आया
माँ का दामन बाँट दिया..
भाई का सर काट दिया…
धरा की छाती छलनी कर् दी..
जंगलों को जहर बांटे…
इंसानी फितूर ने…
सदा भाइयों के हाथ -पैर काटे….!!!!

दरअसल गलती आदमी की भी नहीं
खुदा ने उसे ..मुंह ऐसा दिया कि…
कुत्ते सा भौंके और काटे भी !
जिन्दगी बख्शने वाले भाई के
कुनबे में जहर बांटे भी..?!
पेर ऐसे दिए कि…..पल भर में
वामन की तरह संसार नाप ले..
दिमाग लोमड़ी की तरह कि….
दूसरों का सुख -सार टॉप ले..!
जीभ दिया सुवर सा कि…
जहां भर की गंदगी खाके पचा जाए..
टोक दो कि रोक दो तो…
दुनिया की जान खा जाए…!?!

वृक्ष बन्धु ने पर..सदा बांटा
मौत के बदले …जिंदगी,
आदि से अंत तक कर दी
आदमी की बंदगी…

धरा की कोख से जनते ही
दातुन-दोना-पत्तलों में
फिर खिलौनों -खाट और सामान बन गया,
सूरज की आग और
इंद्र के बज्र से
आसमानी कहर से बचाने आदम के सर तन गया,,
छत बना, घर बना, भोजन-भाजन-शयन बना
जिंदगी भर काम आया
फिर मरा जब आदमी तो
घर से घाट तक
और आखिर में साथ जलकर स्वर्ग तक भी..!!

आदमी यदि हरित बन्धु का
क़त्ल तू करता रहेगा…
धरा औ आकाश बीच
कार्बन भरता रहेगा…
जिंदगी चैन की साँसे
कभी न ले सकेंगी …!
विश्व की प्राण वायु
विष विष विष हो चलेगी…।

तब फिर उगेंगे ये धरा की कोख से
जिंदगी को जान देने
विष के प्रकोप से…
ये हवा का विष को काट
खुद को नेस्तनाबूद करने वालों को
जीवन बांटेंगे…..
जिस तरह आदम
नहीं छोड़ेगा अपनी फितरत,..
पेड़ भी न छोड़ेगा
प्राण वायु देने की नियामत..।

बेचारे पेड़ भाई
सुख में दुःख में
जीने मरने में शामिल..
आदमी के काम आ फुला नहीं समाता,
पर ..तब,..क्रोधित हो जाता है
जब कागजों औ भाषणों में
ऊसे जनता है आदमी..
राष्ट्रिय कोषों को हड़पने
भगवा पहन,अगुवा बनता है आदमी…
टोपी,कुर्सी,वर्दी की जेब भरने
देश जन की छाती में
गढ़े खनता है आदमी..!
उनके लिए प्राण वायु की जगह
विष उगल देगा पेड़…खोकर धैर्य…।।।

डॉ0दिलीप गुप्ता

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