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पिता ईश सम हैं दातारी

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पिता ईश सम हैं दातारी

पिता ईश सम हैं दातारी।
कहते कभी नहीं लाचारी।।1

देना ही बस धर्म पिता का।
आसन ईश्वर सम माता का।।2

तरु बरगद सम छाँया देता।
शीत घाम सब ही हर लेता।।3

बहा पसीना तन जर्जर कर।
जीता मरता संतति हितकर।4

संतति हित ही जनम गँवाता।
भले जमाने से लड़ जाता।।5

अम्बर सा समदर्शी रहकर।
भीषण ताप हवा को  सहकर।।6

बन्धु सखा गुरुवर का नाता।
मीत भला सब पिता निभाता।।7

पीढ़ी दर पीढ़ी खो जाता।
बालक तभी पिता बन पाता।।8

धर्म निभाना है कठिनाई।
पिता धर्म जैसे प्रभुताई।।9

अम्बर हित जैसा ध्रुव तारा।
घर हित वैसा पिता हमारा।।10

जगते देख भोर का तारा।
पूर्व देखलो पिता हमारा।।11

सुत के गम में पितु मर जाता।
राजा दशरथ जग विख्याता।12

मुगल काल में देखो बाबर।
मरता स्वयं हुमायुँ बचा कर।।13

ऋषि दधीचि सा दानी होता।
यौवन जीवन दोनो खोता।।14

पिता धर्म निभना अति भारी।
पाएँ दुख संतति हित गारी।15

पिता पीत वर्णी हो जाता।
जब भी सुत हित संकट आता।16

बाबू लाल शर्मा “बौहरा”
सिकंदरा, दौसा ,राज.

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