KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

नई साल पर कविता

0 1,983

नई साल पर कविता

(दोहा छंद)
नई ईसवी साल में, बड़े दिनों की आस।
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स्वागत नूतन वर्ष का, करते भाव विभोर।
गुरु दिन भी होने लगे, मौसम भी चित चोर।।
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माह दिसंबर में रहे, क्रिसमस का त्यौहार।
संत शांता क्लाज करे, वितरित वे उपहार।।
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सकल जगत में मानते, ईसा ईश महान।
चला ईसवीं साल भी, इसका ठोस प्रमान।।
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साज सज्ज सर्वत्र हो, खूब मने यह रीत।
रहना मेल मिलाप से, भली निभाएँ प्रीत।।
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ईसा के उपदेश का, सब हित है उपयोग।
जैसे सब के हित रहे, प्राणायाम सुयोग।।
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देख सुहाना दृश्य कवि, गँवई, मंद,गरीब।
भाव उठे मन में कई, करते नमन सलीब।।
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नूतन वर्ष विकास की, संगत क्रिसमस रात।
गृह लक्ष्मी दीपावली , सजे उजाले पाँत।।
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उच्च मार्ग देखें निशा , मन में उठे विचार।
सुन्दर पथ ऐसा लगे, इन्द्र लोक पथ पार।।
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ऊँचे चढ़ते मार्ग से, लगता हुआ विकास।
लगातार ऊँचे चढ़े, छू लें चन्द्र प्रकाश।।
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नीचे सागर पर्व सा, ऊपर लगे अकाश।
तारक गण सी रोशनी, फैले निशा प्रकाश।।
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नभ को जाते पंथ को, खंभ रखें ज्यों शीश।
नव विकास सदमार्ग की, राह बने वागीश।।
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आए शांता क्लाज जो, शायद यही सुमार्ग।
उपहारों से पाट दें, गुरबत और कुमार्ग।।
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शहर सिंधु सरिता खड़े, ऐसे पुलिया पंथ।
लगते पंख विकास के, त्यागें सभी कुपंथ।।
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नई ईसवीं साल का , नया बने संकल्प।
तमस गरीबी क्यों रहे, नवपथ नया विकल्प।।
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अभिनंदन नव साल का, करिए उभय प्रकार।
युवकों संग किसान के, श्रमी सपन साकार।।
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बिटिया प्राकृत शक्ति है, बढ़े प्रकाशी पंथ।
पथ बाधाओं रहित हो, उज्ज्वल भावि सुपंथ।
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सत पथ भावी पीढियाँ, चलें विकासी चाल।
सबको संगत लें बढ़ें, रखलें वतन खयाल।।
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नये ईसवीं साल में, बड़े दिनों की आस।
रोजगार अवसर मिले, नूतन पंथ विकास।।
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जीवन में किस मोड़ पर, हों खुशियाँ भरपूर।
साध चाल चलते चलो, दिल्ली क्यों हो दूर।।
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विकट मोड़ घाटी मिले, अवरोधक भी साथ।
पार पंथ खुशियाँ मिले, धीरज कदमों हाथ।।
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सड़क पंथ जड़ है भले, करते हैं गतिमान।
सही चाल चलते चलो, नवविकास प्रतिमान।
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पथ में अवरोधक भले, पथ दर्शक भी होय।
पथिक,पंथ मंजिल मिले, सागर सरिता तोय।
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उच्च मार्ग अवधारणा, सोच विचारों उच्च।
जातिवर्ग मजहब नहीं,उन्नति लक्ष्य समुच्च।।
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पाँव धरातल पर रहें, दृष्टि भले आकाश।
चलिए सतत सुपंथ ही, होंगे नवल विकास।।
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रोशन करो सुपंथ को, सुदृढ स्वच्छ विचार।
रीत प्रीत विश्वास का, करिए सदा प्रचार।।
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नई साल नव पंथ से , मिले नए सद्भाव।
दीन गरीब किसान के, अब तो मिटे अभाव।।
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नव पथ नूतन वर्ष के, संकल्पी संदेश।
नूतन सृजन सँवारिए, नूतन हो परिवेश।।
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क्रिसमस का त्यौहार है, सर्व देश परदेश।
सबको ये खुशियाँ रहें, मिले न दुखिया वेश।!
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शांता क्रिसमस में बने, जैसे दानी कर्ण।
दीन हीन दिव्यांग को, लगता अन्न सुवर्ण।।
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बनो शांता क्लाज करो, उपहारी शृंगार।
मानव बम आतंक सब, करदें शीत अंगार।।
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नव पथ नूतन साल के, लिख दोहे इकतीस।
शर्मा क्रिसमस पे करे, नमन मसीहा ईस।।


© बाबू लाल शर्मा “बौहरा”, विज्ञ

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