KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

श्रीमती पदमा साहू की 10 कवितायेँ

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नारी का साहस

जग में नारी का अवतार चार,
माता , भार्या, पुत्री, बहना।
सौम्य स्वभाव ,त्याग ,सेवा ,
नारी का है अद्भुत गहना।
नारी साहस, प्रेरणा की मूर्ति ,
ममता ,वात्सल्य नारी का खजाना।
नारी है गृहस्ती का पहिया,
परिवार की आस्था और भावना।
रणक्षेत्र में दुर्गा ,लक्ष्मी नारी ।
समाज रक्षक शत्रु संहारणा ।
प्राचीन नारी का गौरव देखो ,
बनके उभरी सामाजिक संरचना।
पशु बलि के पाप कारण,
तजा विवाह श्रमणा ने अपना।
विदुषी नारी का साहस देखो,
गार्गी ने की वेद ऋचा की रचना।
विश्वरा, घोसा,देवयानी,
वैदिक काल की बनी प्रेरणा।
सती अनुसुइया की ममता देखो,
त्रिदेव बाल बनाएं झुलाए पालना।
नारी शौर्य की प्रतिमा देखो,
अंतरिक्ष उड़ान भरने वाली कल्पना।
नारी ,शासन की साम्राज्ञानी,
दुर्गावती ,लक्ष्मी रजिया सुल्ताना।
नारी सुदृढ़ समाज की कड़ी,
नारी जग की पालनहारना।
नारी का साहस अदम्य,
नारी का न मान गिराना।
जिस समाज में पूजा नारी का,
वह समाज है स्वर्ग समाना।

शब्दार्थ=
श्रमणा=शबरी का नाम है, मान=इज्जत
घोसा, देवयानी ये वेदों की रचना करने में सहायक
साम्राज्ञी=शासन करने वाली रानी

श्रीमती पदमा साहू शिक्षिका
खैरागढ़ छत्तीसगढ़

मृत्यु

जन्म लिए जिस घड़ी रेे मानव,
मृत्यु तय हो गई उस दिन!
तन एक वसन बदलते रहे अनेक,
मृत्यु आया काया भी बदलेगी उस दिन!
माया के जाल में मस्त रहे सदा,
मृत्यु ने दस्तक दी चौक गए उस दिन!
राजा,रंक,योगी ध्यानी कोई ना बच पाता,
काल के गाल में समाते हैं जिस दिन!

जनाजे से सिकन्दर जग को बताया,
खाली हाथ जाना है मृत्यु आए जिस दिन!
नश्वर काया संवारे आभूषणों से,
जीवन का अंतिम गहना मृत्यु है
मौत आई तब समझे उस दिन!
जब थमने लगे सांसे सब कर्म नजर आए,
तब चीर निद्रा में सोए मृत्यु है उस दिन!

मृत्यु है जीवन का अंतिम पड़ाव,
आरती थाल सजा रखना मृत्यु आए जिस दिन!
अर्थी को परिजन उठाते कंधे बदल-बदल कर,
जीवन यात्रा का अंत है शमशान में उस दिन!
कर्म ऐसे कर ले रे मानव जग में,
मृत्यु भी प्रणाम करे हमे लेने आए जिस दिन!

पदमा साहू शिक्षिका
खैरागढ़ जिला राजनांदगांव छत्तीसगढ़

वीर के इंतज़ार में नयन

करुण संदेशा ना देना मुझे,
बैठी हूँ तुम्हारी लगाए आस ।
गिन रही हूँ हर वक्त साँसे ,
पथ में बिछाए सुमन मनुहार।
आ जाना तुम कर रही हूँ इंतजार।। रण बाँकुरा हो तुम मेरे वीर ,
शत्रु को पीठ दिखा मत आना ।
मातृभूमि की रक्षा कर्तव्य निभा,
पहन आना विजयश्री का हार।
आ जाना तुम कर रही हूँ इंतजार।। अनुराग भरा उल्लास लाना,
लाना ना होठों पर विषाद।
सोलह श्रृंगार साथ लाना मेरे,
अपने हाथों करना मेरा श्रृंगार।
आ जाना तुम कर रही हूँ इंतजार।। ज्वाला बुझने न देना देश राग का,
भटकने ना देना तुम मन विराग।
स्पंदित ह्रदय में दबा लेना पीड़ा,
पर दफन ना होने देना अंगार।
आ जाना तुम कर रही हूँ इंतजार।। पथिक बन बैठे राह निहारूंँगी,
विजय थाल सजाए अपने आँगन
अश्रु न बहाऊँगी करुण नयनों से,
जी लूंगी मधुमास की स्मृति हार।
आ जाना तुम कर रही हूँ इंतजार।। 

पदमा साहू  पर्वणी……

गंगाजल

राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को,
दिया ऋषि ने क्रुद्ध हो भयंकर श्राप।
श्रापित सगर पुत्र सारे मृत हो गए पर,
आत्मा मुक्त न हुई,विचरते बन भूत-पिशाच।

राजा भागीरथी सगर के वंशज,
किया प्रण पूर्वजों को मुक्ति दिलाने।
कठोर तप वर्षों तक किया,
भागीरथी गंगा को पृथ्वी पर लाने।

प्रसन्न हो प्रभु ने दिया वरदान,
गंगा कोभागीरथी भक्ति से धरा पर लाने।
शिव शंकर जटा पर धारण किए,
तीव्र वेग मंदाकिनी को धरा पर बढ़ाने।

गंगा धरा पर उतर आई बनके गंगाजल,
मुक्त हुए श्रापित आत्मा स्पर्श करते पावन गंगाजल।
गंगादेवी है पापनाशिनी सुखदात्री,
तन मन शुद्ध होते स्पर्श करते गंगाजल ।

अभिषेक, पूजन और शुद्धीकरण,
होता उपयोग पवित्र गंगाजल।
मोक्ष प्रदायिनी जीवनदायिनी,
पाताल की भागीरथी, धरा पर गंगाजल।

पापियों को पाप से है तारती,
मरणासन्न,मृत्युशैया पर गंगाजल।
न जा सको गंगा तीरथ धाम तो,
मात पिता चरणामृत बन जाते गंगाजल।

श्रीमती पदमा साहू खैरागढ़ जिला राजनांदगांव छत्तीसगढ़

मुझे बहुत याद आती है मेरी बचपना

मां के पीछे दौड़ कर आंचल में छिपना,
पच्चीस पैसे के लिए मां को मनाना,
नड्डा,पिपरमेंट उंगलियों में फंसा कर खाना,
दादा की डांट दादी की दुलारना,
मुझे बहुत याद आती है मेरी बचपना।

चाचा-चाची का जोर से पुकारना,
लालटेन और दीए की रोशनी में पढ़ना,
अंतरदेसी कार्ड पर मां बाबू को खत लिखना ,
गर्मी में इमली का लाटा बना कर खाना,
मुझे बहुत याद आती है मेरी बचपना।

सहेलियों के साथ दल में स्कूल पहुंचना,
बस्ते में लाखडी, बोईर, चना का पकड़ना
भामरा मैम को बटकर, बीही, मुनगा देना,
सहेलियों संग गंगाइमली,कसहीका तोड़ना,
बहुत याद आती है मुझे मेरी बचपना।

मुर्रा के लिए शीला बिनने होड़ लगाना,
खेत में चना चटपटी बनाकर खाना,
कार्तिक माह भर रात्रि में स्नान करना,
सहेलियों को घर-घर जाकर उठाना,
बहुत याद आती है मुझे मेरी बचपना।

सहेलियों संग लुकाछीपी गिल्ली डंडा खेलना,
रविवार को तालाब में ढेस सिंघाड़ा निकालना,
पदमा, प्रतिमा,दिलेश,रामेश्वरी सुषमाना,
हर शिवरात्रि पैदल कवही मेला जाना,
बहुत याद आती है मुझे मेरी बचपना ।

श्रीमती पदमा साहू
खैरागढ़ जिला राजनांदगांव छत्तीसगढ़।

आखिर कब तक तय करेगी दुनिया कोरोना की दूरी

जब से शुरू हुई कोरोना की बीमारी,
मानव जीवन पर आफत आन पड़ी भारी।
लोगो में बढ़ गया भय और आपसी दूरी,
हाय, हेलो छोड़ प्राचीन संस्कृति वापस अा गई हमारी।
आखिर कब तक……….

इंसानों ने पंछी को पिंजरे में बनाया कैदी,
पंछी उड़ रहे हैं, इंसान को कैदी बनते न हुई देरी।
एक दूसरे से दूर फोन पे हो रही बाते पूरी,
अपनों से मिलने में कोरोना बन गई है मजबूरी।
आखिर कब तक……….

चारो ओर हाहाकार मचा, बनाए रखना है सामाजिक दूरी,
गरीब के पांव में पड़ गए छाले, पेट में भूखमरी।
अपनों से मिलने की चाह मेंपैदल तय कर रहे मिलो दूरी,
राजा प्रजा से क्षमा मांग रहा, सुरक्षा की ये कैसी मजबूरी।
आखिर कब तक………

सलाम है जन सेवा में लगे, डॉ, नर्स, पुलिस, फ़ौजी की बहादुरी,
अपनो की परवाह किए बिना, पीड़ितो की सेवा करने छोड़ देते है नींद अधूरी।
मरीजों की कतार बढ़ने लगे, ट्रेन भी बन गए अस्पताल की धुरी।
मानव है हम विचार करो, आने मत दो संकट अब बुरी।
आखिर कब तक………….

रुखा सूखा खा गुजार लोकुछ दिन पड़ोसी रिश्तेदारों से कर लो दूरी,
एक दिन यही दूरी, अपनो से बिछड़ने की कम कर देगी दूरी।
हम भारतवासी दुश्मनों को मिटाने संस्कृति शिष्टाचार निभाते हैं पूरी,
हैं आस्था देवी शक्ति वेदशास्त्रं पर, अम्बे करेगी खात्मा बनके संयम कोरोना आसुरी।
आखिर कब तक……

पदमा साहू शिक्षिका
खैरागढ़ जिला राजनांदगांव छत्तीसगढ़।

कलयुग के राम

गुरु, मात पिता मान बढ़ाने,
नित शीश झुकाओ।
आज्ञाकारी धर्म वीर बन,
राम सा छवि बनाओ।
बच्चों कुल का मान बढ़ाने,
*कलयुग के राम बन जाओ।*

भगिनी- भौजाई का मान बढ़ाने,
नित सम्मान दिलाओ।
अनुज का प्रेरणा बन,
राम सा छवि बनाओ।
रिश्ते नातों का लाज बचाने,
*कलयुग के राम बन जाओ।*

देश,समाज सेवा करने,
आगे कदम बढ़ाओ।
देश हित रक्षक बन,
राम सा छवि बनाओ।
बच्चों, भव पार लगाने,
*कलयुग के राम बन जाओ*।

अंधविश्वास, कुरीतियां मिटाने,
धर्म रक्षक बन जाओ।
मानवता का पाठ पढ़ा,
राम सा छवि बनाओ।
बच्चों सभ्य संस्कृति को बचाने,
कलयुग के राम बन जाओ।

पदमा साहू शिक्षिका
खैरागढ़ जिला राजनांदगांव छत्तीसगढ़

मेरे कबीर

मेरे कबीर,
काशी लहरतारा ताल बीच अवतरित होने कबीर!

जेठ सुदी बरसाइत जलज माही पौढ़न किए!!
नीरू नीमा को सांसारिक मात-पिता बना!
जुलाहा घर कबीर अपना चरण पग धर दिए!!
एक दिन स्वामी रामानंदजी ब्रह्म मुहूर्त गंगाघाट पधारे!
चरण लगते स्वामी के कबीर रोने लग गए!!
यह देख स्वामी जी रटने लगे राम नाम बार- बार!
शब्द राम सुन स्वामी जी को गुरु अपना बना लिए!!

कबीर तेजस्वी,अंतर्ज्ञान सागर उर में भरे!
कलयुग में सब जग रमने कबीर नाम धराए !!
मात- पिता के घर रहते जीवन निर्वाह कर!
दो चादर रोज बुन कर परमार्थ दान दिए!!
अद्भुत ज्ञान कबीर का समझे कौन इसे?
कमाल कमाली जीवनदान दे अपना शिष्य बना लिए !!
मसि, कागद, लेखनी कबीर नहीं थामें!
स्थितप्रज्ञ ज्ञान कबीर अपने मुख से जना दिए!!

धर्म दर्शन, मत-मतांतर का था गहरा ज्ञान!
अंधविश्वास उखाड़ फेंकने जन-जन ज्ञान फैला दिए !!
सामाजिक कुरुति पाखंडवाद को मिटाने!
भाईचारा कायम रखने जन में ज्ञान ज्योत जला दिए!!
सत्ता में चूर मदमस्त सिकंदर को!
दिव्य ज्ञान प्रकाश दिखा राह में ला दिए!!
साखी, शबद, रमैनी, उलटवासी तुम्हारी !
अटपट ज्ञान से भरे गागर झटपट कोई न समझ पाएं!!

मुड़ जड़बुद्धि चेताने घट-घट चोट मार तुम!
भवबंधन मिटाने अलख ज्ञान जन में भर दिए!!
अपना ज्ञान भंडार बांटने शिष्य की पहचान में!
काशी से बांधवगढ़ धर्मदास आमीन घर आए !!
करोड़ों धनसंपदा ठुकरा अपना भाग्य जगा!
धर्मदास गुरू पहचान तुम्हारे शिष्य हो लिए!!
ज्ञान की गंगा उधेड़ धर्मदास पर कबीर!
जग को परमपद तत्वज्ञान दे दिए!!

मगहर प्राण तजे गधा होई काशी तजे मुक्ति मिले!
यह मतिभ्रम मिटाने काशी से मगहर जा ज्ञान फटकार लगाए!!
क्या काशी, क्या मगहर, क्या उसर जमीन?
ह्रदय में राम तो छूटे प्राण कहीं यह भ्रम दूर कर दिए !!
झूठी काया झूठी माया नश्वर जग छोड़ कबीर!
सुमन में जन्म ले अंत समय सुमन में ही हो लिए !!

श्रीमती पदमा साहू खैरागढ़
जिला राजनांदगांव छत्तीसगढ़

मैं कौन हूं?

मैं कौन हूं, कहाँ से आयी?
किस कारण जन्म हुआ मेरा विचारती हूं।
ईश्वर के हाथों बंधी कठपुतली मैं,
सृजनकार की अमूल्य कृति हूं।
जिसने मुझे जन्म दिया जग में,
उसे बारंबार प्रणाम करती हूं।
गर्भवास में कौल किया प्रभु से,
नित स्मरण उसे मैं करती हूं।

रेलमरेला इस संसार में,
अपनी पहचान ढूंढती हूं।
मेरी सांसों की डोरी प्रभु के हाथों,
प्रभु खेवनहार मैं भवसागर की कस्ती हूं।
क्या है मेरे जीवन का लक्ष्य,
पाने उसे सतत संघर्ष करती हूं।
जाने कब सांसों की डोरी टूट जाए,
सत्कर्म करने नित पग धरती हूं।

स्वार्थ भरे इस माया जग में,
स्वयं में मैं कौन तलाशती हूं।
पंचतत्व की बनी यह कोठरिया,
भ्रमवश इसे मैं संवारती हूं।
पूरे ना होते अरमान कभी ,
नीरस मन को मैं समझाती हूं।
परमार्थ कुछ काज करने ,
खुद को खुदा में तलाशती हूं।

मिला मुझे मेरा उद्देश्य ,
मैं नश्वर काया को धिक्कारती हूं।
प्रभु कठिन राह में देना साथ मेरा,
दुख में भी सुख तलाशती हूं।
जिसे अपना माना वह भ्रम मेरा,
नश्वर जग में प्रभु तुम्हें तलाशती हूं।
ईश्वर के हाथों बनी कठपुतली मैं,
धरा रंगमंच पर प्रभु हाथों नाचती हूं।

श्रीमती पदमा साहू खैरागढ़
जिला राजनांदगांव छत्तीसगढ़

माँ

मां तुम धरा की अमूल्य धरोहर,

तुम होअद्भुत,अतुल्य जीवन निर्मात्री।

नौ माह कोख में रक्त से सींचती,

मां तुम हो बच्चों की जन्मदात्री।

मां तुम बच्चों की होती प्रथम गुरु,

जीवन रूपी पाठशाला की विधादात्री।

मां तुम धरा की अमूल्य धरोहर,,,,

मां के चरणों में निहित स्वर्ग,तीर्थ धाम सभी,

मां तुम हो करुणा, ममता की मूरत क्षमादात्री।

मां तुम तमस में आशा की किरण,

तुम हो संतान रक्षक, दुष्ट दलन कालरात्रि।

मां तुम धरा की अमूल्य धरोहर,,,,

शरद, ग्रीष्म, वर्षा को आंचल में समेटे,

मां तुम हो त्याग की देवी छांया दात्री।

मां तुम स्वयंअपनी क्षुधा भूलकर,

बच्चों की हो क्षुधातृप्त कराने वाली अन्नदात्री।

मां तुम धरा की अमूल्य धरोहर,,,

मां तेरे गोरस का कर्ज हम पर,

जन्म जन्मांतर हो हम क्षमाप्रार्थी।

मां की गोद और आंचल पाने,

भगवान भी बन जाते हैं शरणार्थी।

मां तुम धरा की अमूल्य धरोहर,,,,

श्रीमती पदमा साहू शिक्षिका

खैरागढ़ जिला राजनांदगांव छत्तीसगढ़

श्रीमती पदमा साहू की 10 कवितायेँ
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