कवि रमेश कुमार सोनी की कविता

0 33

कवि रमेश कुमार सोनी की कविता

बसंत के हाइकु – रमेश कुमार सोनी

1

माली उठाते/बसंत के नखरे/भौंरें ठुमके।

2

बासंती मेला/फल-फूल,रंगों का/रेलमपेला।

3

फूल ध्वजा ले/मौसम का चितेरा/बसंत आते।

4

बागों के पेड़/रोज नया अंदाज़/बसंत राज।

5

बासंती जूड़ा/रंग-बिरंगे फूल/दिल ले उड़ा ।

6

आओ श्रीमंत/दिखाऊँ कौन रँग/कहे बसंत।

7

फूल-भँवरे/मदहोश श्रृंगारे/ऋतुराज में।

8

बसंत गली/भौंरें मचाए शोर/मधु की चोरी।

9

बसंत आते/नव पल्लव झाँके/शर्माते हरे।

10

खिले-महके/बसंत लौट जाते/प्यार बाँटते।

11

कोई तो रोके/मेरा बसंत जाए/योगी बनके।

12

खिले-बौराए/कनक सा बसंत/झरे बौराए ।

13

बसंत बप्पा/जाओ जल्दी लौटना/खिलाने चम्पा।

14

फूल चढ़ाने/पतझर के कब्र/बसंत आते।

15

बसंत लाता/सौंदर्य का उत्सव/रंगों का मेला।

16

बासंती ‘गिफ्ट’/फूल तोड़ना मना/भौरों को ‘लिफ्ट’ ।

रमेश कुमार सोनी कबीर नगर-रायपुर, छत्तीसगढ़

बसन्त की सौगात

शर्माते खड़े आम्र कुँज में
कोयली की मधुर तान सुन
बाग-बगीचों की रौनकें जवाँ हुईं
पलाश दहकने को तैयार होने लगे
पुरवाई ने संदेश दिया कि-
महुआ भी गदराने को मचलने लगे हैं।
आज बागों की कलियाँ
उसके आने से सुर्ख हो गयी हैं
ज़माने ने देखा आज ही
सौंदर्य का सौतिया डाह ,
बसंत सबको लुभाने जो आया
प्रकृति भी प्रेम गीत छेड़ने लगी।
भौरें-तितलियों की बारातें सजने लगी
प्रिया जी लाज के मारे
पल्लू को उँगलियों में घुमाने लगीं,
कभी मन उधर जाता
कभी इधर आता
भटकनों के इस दौर में
उसने -उसको चुपके से देखा
नज़रों की भाषाओं ने
कुछ लिखा-पढ़ा और
मोहल्ले में हल्ला हो गया।
डरा-सहमा पतझड़
कोने में खड़ा ताक रहा है
बाग का चीर हरने,
सावन की दहक
अब युवा हो चली है,
व्याह की ऋतु
घर बदलने को तैयार थी,
फरमान ये सुनाया गया-
पंचायत में आज फिर कोई जोड़ा
अलग किया जाएगा
कल फिर कोई युवा जोड़ी
आम की बौरों की सुगंध के बीच
फंदे में झूल जाएगा!
प्यार हारकर भी जीत जाएगा
दुनिया जीतकर भी हार जाएगी;
इस हार-जीत के बीच
प्यार सदा अमर है
दिलों में मुस्काते हुए
दीवारों में चुनवाने के बाद भी ।
बसंत इतना सब देखने के बाद भी
इस दुनिया को सुंदर देखना चाहता है
इसलिए तो हर ऋतु में
वह जिंदा रहता है
कभी गमलों में तो
कभी दिलों में
बसंत कब,किसका हुआ है?
जिसने इसे पाला-पोषा,महकाया
बसंत वहीं बगर जाता है
तेरे-मेरे और हम सबके लिए
रंगों-सुगंधों को युवा करने।
——
रमेश कुमार सोनी
बसना, छत्तीसगढ़
7049355476

कोई आखिरी दिन नहीं होता

ज़माना भूल चुकाउन्हें जिन्होंने कभी प्यार को खरीदना चाहा,
मिटाना चाहा, बर्बाद करना चाहा-
प्रेमी युगलों को सदा से
लेकिन वे आज भी जिन्दा हैं–

कुछ कथाओं में एवं
कहीं बंजारों के कबीलों के गीतों में ठुमकते हुए|
प्यार ऐसे ही जिन्दा रहता है
जैसे- वृद्धाश्रम में यादें,
आज सहला रहे थे
अपने अंतिम पलों को
हम दोनों वो कह रही थी–

तुम्हारे पहले चुम्बन की उर्जा
अब तक कायम है वर्ना….
और मैं भी उसी दिन मर गया था–
जिस दिन तुम्हें पहली बार देखा था
जिन्दा तो मुझे तुम्हारी नज़रों ने रखा है|
वृद्धाश्रम में केक काटते हुए
प्यार आज अपनी हीरक जयंती मना रही है
मानो आज उनका ये आखिरी दिन हो!

वैसे बता दूँ आपको प्यार के लिए
कोई आखिरी दिन नहीं होता
और प्यार कभी मरता नहीं
यह सिर्फ देह बदलता है ज़माने बदलते हैं |

रमेश कुमार सोनी LIG 24 कबीर नगर रायपुर छत्तीसगढ़ 7049355476

जूड़े का गुलाब

स्त्री और धरती
दोनों में से बहुत लोगों ने
सिर्फ स्त्रियों को चुना
और प्रेम के नाम पर
उनके पल्लू और जूड़ों में बँध गए;

प्रदूषणों का श्रृंगार किए
विधवा वेश सी विरहणी वसुधा
कराहती रही
तुम्हारी बेवफाई पर|

उसकी गोद में कभी जाओ
तो पाओगे
लाखों स्त्रियों के रिश्तों का प्यार एक साथ,
प्यार जब भी होता है तब–
बहारें खिलनी चाहिए,
संगीत के सोते फूटने चाहिए….;

कोई कभी भी नहीं चाहता कि–
कोई उसे बेवफा कहे
मजबूरियाँ आते–जाते रहती हैं|
प्यार जो एक बार लौटा
तो दुबारा नहीं लौटता,
ना ही मोल ले सकते
और ना ही बदल सकते;

इसलिए सँवारतें रहें
अपनी धरती को
अपने प्रेयसी की तरह|
कहीं कोई तो होगी
जो आपके खिलाए हुए गुलाब को
अपने जूड़े में खोंचने को कहेगी
उस दिन गमक उठेगी
धरती और आपका बागीचा
सुवासित हो जाएगा गुलाब,
स्त्रियाँ और वसुधा अलग कहाँ हैं?

रमेश कुमार सोनी LIG 24 कबीर नगर रायपुर छत्तीसगढ़ 7049355476

खिड़की-रमेश कुमार सोनी

खिड़कियों के खुलने से दिखता है-
दूर तक हरे-भरे खेतों में
पगडंडी पर बैलों को हकालता बुधारु
काकभगोड़ा के साथ सेल्फी लेता हुआ
बुधारु का ‘टूरा’ समारु
दूर काली सड़कों को रौंदते हुए
दहाड़ती शहरी गाड़ियों के काफिले
सामने पीपल पर बतियाती हुई
मैना की जोड़ी और
इसकी ठंडी छाया में सुस्ताते कुत्ते।


खिड़की को नहीं दिखता-
पनिहारिन का दर्द
मजदूरों के छाले
किसानों के सपने
महाजनों के पेट की गहराई
निठल्ली युवा पीढ़ी की बढ़ती जमात
बाज़ार की लार टपकाती जीभ
कर्ज में डूब रहे लोगों की चिंता और
अनजानी चीखों का वह रहस्य
जो जाने किधर से रोज उठती है और
जाने किधर रोज दब भी जाती है।


खिड़की जो मन की खुले तो
देख पाती हैं औरतें भी-
आज कहाँ ‘बुता’ में जाना ठीक है
किसका घर कल रात जुए की भेंट चढ़ा
किसके घर को निगल रही है-शराब
किसका चाल-चलन ठीक नहीं है
समारी की पीठ का ‘लोर’ क्या कहता है;
सिसक कर कह देती हैं वे-
‘कोनो जनम मं झन मिलय
कोनो ल अइसन जोड़ीदार’ ।


बंद खिड़की में उग आते हैं-
क्रोध-घृणा की घाँस-फूस
हिंसा की बदबूदार चिम्मट काई
रिश्तों को चाटती दीमक और
दुःख की सीलन
इन दिनों खिड़की खुले रखने का वक्त है
आँख,नाक,कान के अलावा
दिल की खिड़की भी खुली हो ताकि
दया,प्रेम,करुणा और सौहाद्र की
ताजी बयार से हम सब सराबोर हो सकें ।


रमेश कुमार सोनी, बसना

अक्षय पात्र -रमेश कुमार सोनी



किसी बीज की तरह
प्यार भी उगता है और
हरिया जाता है
जीवन सारा ।
महकने लगते हैं
प्यार के वन ,
बहने लगते हैं
गीतों का सरगम
लोग सुनने लगते हैं
प्यार के किस्से बड़े प्यार से
छुप – छुपाकर ।


प्यार के साथ ही उग आते हैं
खरपतवार जैसे
काँटो का जिस्म लिए लोग
कुल्हाड़ी और आरे जैसी इच्छाएँ
प्यार का शोर फैल जाता है
अफवाहों और कानाफूसी की दुनिया में
मारो – काटो
जला दो , जिंदा चुनवा दो
जैसे शब्द हरे हो जाते हैं
प्यार का खून चूसने ।


प्यार फिर ठूँठ बना दिए जाते हैं ,
बीज बनने से पहले
कुतर गए लोग इसका फल
प्यार को भी अब
रेड डाटा बुक में रखना होगा ,
कैसे कह सकोगे तुम
मेरे प्यार के बाद भी
बचेगा तुम्हारे संसार के लिए
थोड़ा सा प्यार ,
लोग भूल जाते हैं कि –
प्यार का अक्षय पात्र दिलों में होता है
सदा से धड़कता हुआ सुर्ख युवा ।
रमेश कुमार सोनी,बसना

साइकिलों पर घर

अलग-अलग पगडंडियों से
गाँवों के मजदूर
अपनी जरूरतें
मुँह पर चस्पा किए

साइकिलों से खटते हुए
पहूँचते हैं शहर में ,
शहर में है –
उनके खून – पसीने को

पैसों में बदलने की मशीन ।
साइकिलों में टँगे होते हैं –
बासी, मिर्च और प्याज के साथ
परिवार की ताकत का स्वाद,

काम करता है मजदूर
अपने इसी मिर्च की भरभराहट खत्म होने तक ,

इनकी छुट्टियों को जरूरतों ने
हमेशा से खारिज कर रखा है,

वापसी साइकिलों में टँगे होते हैं –
घर की जरूरतें और उम्मीद
शहर उम्मीदों और
जरूरतों का विज्ञापनखोर है ।

इसी तरह टँगा होता है
साइकिलों पर घर
जहाँ डेरा डाला गाँव बना लिया

इन्हीं से बची है –
खूबसूरती संवारने की ताकत
एक स्वच्छ और सुंदर शहर
साइकिलों पर टिका हुआ है।


——— ———
रमेश कुमार सोनी
कबीर नगर- रायपुर छत्तीसगढ़
संपर्क- 7049355476

बधाई हो तुम…

भुट्टा खाते हुए
मैंने पेड़ों पर अपना नाम लिखा
तुमने उसे अपने दिल पे उकेर लिया,
तुमने दुम्बे को दुलारा
मेरा मन चारागाह हो गया;
मैंने पतंग उड़ाई
तुम आकाश हो गयीं
मैं माँझे का धागा
जो हुआ तुम चकरी बन गयी|
ऐसा क्यों होता रहा?
मैं कई दिनों तक
समझ ना सका
एक दिन दोस्तों ने कहा–
ये तो गया काम से,
और तुम तालाबंदी कर दी गयी
मेरे जीवन के कोरे पन्ने पर
बारातों के कई दृश्य बनते रहे
और गलियों का भूगोल बदल गया|
तुम्हारी पायल ,
बिंदी और महावर वाली निशानियाँ
आज भी मेरे मन में अंकित है
किसी शिलालेख की तरह,
किसी नए मकान पर
शुभ हथेली की पीले छाप के जैसी
मैं देखना चाह रहा था
बसंतोत्सव और मेरा बसंत
उनके बाड़े में कैद थी|
मैं फटी बिवाई जैसी
किस्मत लिए कोस रहा था
आसमान को तभी तरस कर
मेघ मुझे भिगोने लगी
इस भरे सावन में
मेरा प्यार अँखुआने लगा
हम भीगते हुए भुट्टा खा रहे हैं
और उसने अपने दांतों में दुपट्टा दबाते हुए
धीरे से कहा–बधाई हो तुम….
और झेंपते हुए उसने
गोलगप्पे की ओर इशारा किया…..|
– रमेश कुमार सोनी LIG 24 कबीर नगर रायपुर छत्तीसगढ़ 7049355476

मुस्कुराता हुआ प्रेम

प्रेम नहीं कहता कि–
कोई मुझसे प्रेम करे
प्रेम तो खुद बावरा है
घुमते–फिरते रहता है
अपने इन लंगोटिया यारों के साथ–
सुख–दुःख,घृणा,बैर,
यादें और हिंसक भीड़ में;

प्रेम सिर्फ पाने का ही नहीं
मिट जाने का दूसरा नाम भी है|
प्रेम कब,किसे,कैसे होगा?
कोई नहीं जान पाता है
ज़माने को इसकी पहली खबर मिलती है,
यह मुस्कुराते हुए मलंग के जैसे फिरते रहता है;

कभी पछताता भी नहीं कहते हैं
लोग कि–
प्रेम की कश्तियाँ डूबकर ही पार उतरती हैं|
मरकर भी अमर होती हैं
लेकिन कुछ लोगों में
यह प्रेम श्मशान की तरह दफ़न होते हैं
वैसे भी यह प्रेम कहाँ मानता है–

सरहदों को, जाति–धर्म को
ऊँच–नीच को
दीवारों में चुनवा देने के बाद भी
हॉनर किलिंग के बाद भी
यह दिख ही जाता है
मुस्कुराता हुआ प्रेम
मुझे अच्छा लगता है….|

रमेश कुमार सोनी LIG 24 कबीर नगर रायपुर छत्तीसगढ़ 7049355476

Leave A Reply

Your email address will not be published.