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प्रकृति है जीवन का उपहार

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प्रकृति है जीवन का उपहार

प्रकृति है जीवन का उपहार,
इसे हम कब संभालेंगे।
धरा की पावन आसन पर ,

इसे हम कब पौढ़ायेंगे।
बचा ले अपने जीवन में ,

स्वास के दाताओं को अब ,

नहीं तो श्वास और उच्छवास को

हम भूल जाएंगे।
बेखट कट रहे हैं पेड़,

हमारी ही इच्छाओं से ,

उजड़े बाग उपवन वन ,

हमारी दुर्बलताओं से।
है निर्बल तन ,व्यथित है मन,

परंतु जान न पाते हैं।
संभलना हम सभी को है ,

स्वयं ही भूल जाते है।
दूर हो जाती हिमनदियां ,

अपनी हिम सीमाओं से ,

जैसे भाग रही है वो अपनी ही विपदाओं से।
छिद्र ओजोन का, तुम को बताता है संभलना है ।
नहीं तो राख हो जाएंगे अपने ही कर्मफल से ।
प्रकृति से ना करो खिलवाड़, वरना रूठ जाएगी।
जगत में पर्यावरण का, संतुलन कर ना पाएगी।
बनाना और मिटाना दोनों मानव के ही हाथों में
अगर तैयार है मानव,
प्रकृति भी उसे दुलारे गी।

Name- Vishweshwari gupta (lect. @govt hss chinnd)
Residence – Sarangarh pin(496445)

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1 Comment
  1. एकता गुप्ता says

    बहुत ही सुंदर प्रस्तुति