प्रकृति की पीड़ा

मानव को प्रकृति की रक्षा के लिये सचेत करना

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प्रकृति की पीड़ा

हे प्यारी प्रकृति,
तुझ में आ रही विकृति,
तू बन जा अनुभूति,
विनाश को न दे तू आकृति,
तू रच ऐसी सुंदर सुकृति।
संभाल ले, तू कर उद्धार ,
भूमंडल में मच रहा हाहाकार, कौन होगा इसका जिम्मेदार?
हे मानव! कर प्रकृति पर उपकार,
मत मचा तू इतना शोर ,
होगी विकृति तो न चलेगा तेरा जोर।
सभी प्रदूषण से बेजार,
साँस लेना भी हो गया दुस्वार
जीने के लिए करना होगा इंतजार
न कर चूक तू बारंबार,
सोच ले तू एक बार
धरा से अंबर तक कर ले तू सुधार ,
विश्व में होगी तेरी जय जयकार।

माला पहल मुंबई

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