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प्राणों से भी प्यारा देश- श्री सुमित्रानंदन पंत

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प्राणों से भी प्यारा देश- श्री सुमित्रानंदन पंत


प्राणों से भी प्यारा, भारत, सब देशों से न्यारा है।
प्राणों से भी प्यारा है। सब देशों से….


गंगा यमुना की धाराएँ, हिमगिरि की उत्तुंग शिखाएं
केशर की क्यारी नंदन वन, हरियाली केरल मन भाए।
सागर अर्घ्य चढ़ाता नित-नित, शीष चरण रज धारा है। प्राणों से


वर्षा आतप शीला सुहाता, है पावन अतिशय सुखदाता,
और बस का शीतल झोंका, मादकता रस बरसाता।
पतझर के झोंकों में संचित, नव जीवन की धारा है। प्राणों से


दीप पर्व पर दीप जलाते, रंग उड़ाकर फाग मनाते,
रावण वध कर पुण्य, दशहरा पर अतिशय हर्षाते।
राखी के पावन धागों पर, शत-शत जीवन वारा है। प्राणों से


जली यहीं जौहर की ज्वाला, सूर्या और परमाल सी बाला,
खूब लड़ी झाँसी की रानी, पान किया मीरा विष प्याला
सीता, सावित्री, अनुसुइया, का सतीत्व व्रत न्यारा । प्राणों से ..


यहाँ प्रताप शिवा सा सानी, सूर और तुलसी सा ज्ञानी
हुआ धनुर्धर पार्थ सरीखा, वीर कर्ण सा अनुपम दानी,
गुरु गोविन्द, नानक ने आहुति, देकर इसे संवारा है।


– श्री सुमित्रानंदन पंत

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