हरिश बिष्ट का प्रातः वंदना

हरिश बिष्ट का प्रातः वंदना

हे बजरंगी तेरे द्वारे |
हाथ जोड़ सब भक्त पुकारे ||
दुष्टों को तुम मार भगाते |
भक्त जनों को पार लगाते ||

सेवा-भाव से सदा समर्पित |
प्रभु चरणों में जीवन अर्पित ||
भक्ति आपसे सीखे कोई |
आप जगाऍं किस्मत सोई ||

चौपाई छंद

मातु-भवानी जय जगदम्बे |
विनती सुन लो हे माँ अम्बे ||
सुनती सबकी करुण पुकारें |
हर मुश्किल को पल में टारें ||

जो भी माॅं के दर पे जाता |
सच्चे मन से शीश नवाता ||
उसके सब दुखड़े हर लेती |
खुशियों से झोली भर देती ||

अनुकूला छंद


सीख सभी को गुरुजन देते |
ज्ञान बढ़ाते तम हर लेते ||
राह दिखाते सच बतलाते |
भाग्य जगाते मन महकाते ||

कुण्डलिया


गणपति की पूजा करें , लडुवन का दें भोग |
जीवन में प्रतिपल सदा, बनते मंगल योग ||
बनते मंगल योग , भक्त घर-घर में लाते |
सजे हुए पंडाल , सभी जयकार लगाते ||
भक्तजनों को आप , सदा ही देते सन्मति |
शिव-गौरा के लाल, सभी को भाते गणपति ||

तांटक छंद


सुबह-सवेरे दर्शन देकर,
सबको राह दिखाते जी |
बनें सदा पाबंद समय के,
सदा यही सिखलाते जी ||

रहना सीखें सदा प्रेम से,
मन से बैर भगाएँ जी ||
भेदभाव हो नहीं किसी से,
सबको गले लगाएँँ जी ||

सरसी /कबीर छंद


सब नाथों के नाथ कहावे,
जग में भोले नाथ |
भक्ति-भाव से जो भी ध्यावे,
रहते उसके साथ ||
रूप अनेकों नाम अनेकों,
रहते अंतर्ध्यान |
शिवशंकर की महिमा का सब ,
भक्त करे गुणगान ||

हरीश बिष्ट “शतदल”

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