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प्रजातंत्र पर कविता

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प्रजातंत्र पर कविता


जहरीला धुंआ है चारो ओर,
मुक्त हवा नहीं है आज,
पांडव सर पर हाथ धरे हैं,
कौरव कर रहे हैं राज!

समाज जकड़ा जा रहा है,
खूनी अमरबेल के पंजों में,
नित्य फंसता ही जा रहा है,
भ्रष्टाचार के शिकंजों में!

आतंक का रावण
अट्टहास कर रहा है,
कहने को है प्रजातंत्र,
अधिकारों का हनन,
कोई खास कर रहा है!

शासन की बागडोर है,
उनके हाथ,गुंडे-लफंगे हैं ,
जिनके साथ!
भ्रष्ट राजनीति के शोरगुल में,
दबकर रह गई है,
आमजन की आवाज़!

पांडव सर पर हाथ धरे हैं,
कौरव कर रहे हैं राज…..
—-
डा.पुष्पा सिंह’प्रेरणा’
अम्बिकापुर।

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