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प्रकृति पर कविता – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

इस रचना में रचनाकार जिन्दगी को एक अलग ही नजरिये से देखने की कोशिश कर रहा है |
सोचता हूँ – कविता -मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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प्रकृति पर कविता – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

सोचता हूँ प्रकृति
कितनी महान है जहां
पंखुड़ियों का खिलना
प्रातः काल में
जीवन के
पुष्पित होने का
आभास होता है

पेड़ों पर पुष्पों का होना
हमारे चारों ओर
शुभ का संकेत होता है

पुष्प का फल में
परिवर्तित होना
हमारे आसपास
किसी नए मेहमान के
आने का प्रतीक है

सोचता हूँ
हवाओं से
पेड़ों का बार बार
हिलना, झुकना
और फिर खड़े हो जाना
किस बात की ओर
इंगित करते हैं

निष्कर्ष से जाना
कि ये हवायें
जिंदगी के थपेड़े हैं
मुसीबतें हैं, घटनायें हैं
जो हमें समय – समय पर आकर
जीवन को मुश्किलों में भी
डटकर कठिनाइयों
का सामना कर
नवीन अनुभव देकर
जीवन को पुष्पित करती है

एक बात
जो मुझे कचोट जाती है
टीस देती है
वह है पेड़ों पर से
फलों का टूटकर गिरना
जो जिंदगी के
अंतिम सत्य की ओर
इशारा करता है

जीवन यहीं तक है
और इसके बाद
पुनः नया जीवन
चूंकि
जब फल के बीज
बारिश की बूंदों
का आश्रय पाकर
पुनः अंकुरित होंगे
और पुनः एक
नवीन पौध का
निर्माण होगा

यह जीवन चक्र
यूं ही चलता रहेगा
हर क्षण हर युग
आने वाली पीढ़ी को
पुष्पित करता रहेगा

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