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पर्यावरण असंतुलन पर कविता-अकिल खान

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पर्यावरण असंतुलन पर कविता-अकिल खान

पर्यावरण असंतुलन पर कविता-अकिल खान

काट वनों को बना लिए सपनों सा महल,
अति दोहन से भूमि में होती हर-पल हल-चल।
रासायनिक दवाईयों का खेती में करते अति उपयोग,
बंजर हो गई धरती की पीड़ा को क्यों नहीं समझते लोग।
मिलकर करेंगे प्रकृति की समस्याओं का उन्मूलन,
होकर कर्मठ करेंगे हम, पर्यावरण का संतुलन।

जनसंख्या वृद्धि से भयावह हो गया धरती का हाल,
अपशिष्ट – धुआँ और कल – कारखाने बन गया मानव का काल।
सुंदर वन पशु-पक्षियों के कारण खुबसूरत दिखती थी धरती,
बचालो जग को ये धरा मानव को है गुहार करती।
अनदेखा करता है इंसान इन समस्याओं को कैसी है ये चलन,
होकर कर्मठ करेंगे हम, पर्यावरण का संतुलन।

कल – कल नदी का बहना और झरनों की मन मोहक आवाज,
कम होते जल से स्तर प्राकृतिक संकट का हो गया आगाज।
चिड़ियों की चहचहाहट और फूलों की मुस्कान,
ऐसे दृश्यों को मिटाकर दुःखी क्यों है इंसान।
मानव के खातिर बिगड़ गया प्राकृतिक संतुलन,
होकर कर्मठ करेंगे हम, पर्यावरण का संतुलन।

नये वस्त्र – मकान की लालच में पेड़ों को दिए काट,
हो गए प्रदूषित नदी – समुद्र और तालाब – घाट।
बंजर हो गया धरा प्लास्टिक के अति उपयोग से,
इन समस्याओं का होगा निदान पेपर बैग के उपभोग से।
सुधर जाओ यही है समय बैठ एकांत में करो मनन,
होकर कर्मठ करेंगे हम, पर्यावरण का संतुलन।

उमस-गर्मी से बढ़ता है प्रतिदिन तापमान,
देखो जल रही है धरती और आसमान।
विषैला हो गया हवा प्रदूषित हो गया है पानी,
मानव की मनमानी से प्रकृति को हो रहा है हानि।
लगाऐंगे पेड़ होगा शुद्ध हवा – धरा और गगन,
होकर कर्मठ करेंगे हम, पर्यावरण का संतुलन।


—- अकिल खान रायगढ़ जिला – रायगढ़ (छ. ग.) पिन – 496440.

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