KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

पर्यावरण संरक्षण

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पर्यावरण संरक्षण


.(लावणी छंद १६,१४)

सुनो मनुज इस,अखिल विश्व में,
पृथ्वी पर जीवन कितने।
पृथ्वी जैसे पिण्ड घूमते,
अंतरिक्ष में वे कितने।।

नभ में गंगा , सूरज मंडल,
कैसे,किसने बना दिए।
इतने तारे,चन्द्र, पिण्ड,ग्रह,
उप ग्रह कितने गिना दिए।।

पृथ्वी पर जल वायू जीवन,
और सभी सामान सजे।
सबसे सुन्दर मनुज बना है,
मनु ने कितने साज सृजे।।

ईश सृष्टि और मानव निर्मित,
दृग से दिख रहे आवरण।
चहूँ मुखी है अर्थ समाहित,
मिल कर बने पर्यावरण ।।

मानव विकास के ही निमित्त,
नित नूतन इतिहास रचें।
इसी दौड़ में भूल रहे मनु ,
पर्यावरण जरूर बचे।।

पर्यावरण जरूर संतुलन
स्वच्छ,स्वस्थ आवरण रहे।
मनु बस मानवता अपनाले,
शुद्ध,सत्य , सदाचरण हो।।

मातप्रकृति ब्रह्माण्ड सुसृष्टा,
कुल संचालन करती है।
सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, सितारे,
ग्रह, उपग्रह, सरती है।।

जगमाता का रक्षण वंदन,
पर्यावरण सुरक्षण कर।
ब्रह्माण्ड संतुलन बना रहे,
अपना मन संकल्पित कर।

मात् प्रकृति,है माता जननी,
सृष्टा का साम्राज्य चले।
आज अभी संकल्प करे हम,
माता समता रहे भले।।

नीर प्रदूषण, वायु प्रदूषण,
भू प्रदूषण,ध्वनि प्रदूषण।
अमन प्रदूषण,गगन प्रदूषण,
मानव मन, मनो प्रदूषण।

ओजोन पर्त भी भेद रहे,
नितनूतन राकेटो से।
अंतरिक्ष में भेज उपग्रह,
नभ वन में आखेटों से।।

‘ग्रीनहाउस इफेक्ट’ चलाते,
तापमान भू का बढ़ता।
ध्रुवक्षेत्रों की बर्फ पिघलती,
सागर जल थल को चढ़ता।

कहीं बाढ़ है,सूख कहीं है,
कंकरीट के वन भारी।
प्राकृत से यूँ खेल खेलना,
बस हल्की सोच हमारी।।

एटम बम या युद्ध परीक्षण,
नये नये हथियार,खाद।
देश,होड़ से दौड़ मे दौड़े,
नित नित करे विवाद।।

“बीती ताहि बिसारि मनुज” तू
जीवन की तैयारी कर।
पेड़ लगे बचे पर्यावरण,
संरक्षण तैयारी कर।

पर्यावरण अशुद्ध रहा तो,
जीवन क्या बच पाएगा।
वरना प्यारे, मनुज हमारे,
धरा धरा रह जाएगा।
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बाबू लाल शर्मा,बौहरा,

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