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पत्थर दिल पर कविता

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पत्थर दिल पर कविता

लता लता को खाना चाहे,
कली कली को निँगले!
शिक्षा के उत्तम स्वर फूटे,
जो रागों को निँगले!

सत्य बिके नित चौराहे पर,
गिरवी आस रखी है
दूध दही घी डिब्बा बंदी,
मदिरा खुली रखी है!
विश्वासों की हत्या होती,
पत्थर दिल कब पिघले!
लता लता को खाना चाहे
कली कली को निँगले!

गला घुटा है यहाँ न्याय का,
ईमानों का सौदा!
कर्ज करें घी पीने वाले
चाहे बिके घरौंदा!
होड़ा होड़ी मची निँगोड़ी,
किस्से भूले पिछले!
लता लता को खाना चाहे,
कली कली को निँगले!

अण्डे मदिरा मांस बिक रहे,
महँगे दामों ठप्पे से!
हरे साग मक्खन गुड़ मट्ठा,
गायब चप्पे चप्पे से!
पढ़े लिखे ही मौन मूक हो,
मोबाइल से निकले!
लता लता को खाना चाहे,
कली कली को निँगले!

बेटी हित में भाषण झाड़े,
भ्रूण लिंग जँचवाते!
कहें दहेजी रीति विरोधी,
बहु को वही जलाते!
आदर्शो की जला होलिका
कर्म करें नित निचले!
लता लता को खाना चाहे,
कली कली को निँगले!

संस्कारों को फेंक रहे सब,
नित कचरा ढेरों में!
मात पिता वृद्धाश्रम भेजें
प्रीत ढूँढ गैरों में!
वृद्ध करे केशों को काले,
भीड़ भाड़ में पिट ले!
लता लता को खाना चाहे,
कली कली को निँगले!
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✍©
बाबू लाल शर्मा बौहरा
सिकंदरा दौसा राजस्थान
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