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राष्ट्रीय एकता : लहराता शान तिरंगा (ओज प्रधान कविता)

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राष्ट्रीय एकता

आजादी का जोत जलाने जला कोई पतंगा है,

मस्त-मस्त मदमस्त मता आज मतंगा है ।

यशस्वी यशगुंजित यशगान से,

पुनीत पुनीत पुलकित पंकज पुमंगा है ।।


निश्चय श्वेत रंग से अंग-अंग श्वेत अंगा है,

देशभक्ति रक्त मांगती रक्तिम अब उमंगा है ।

जागरण हो आचरण में तो,

भीष्म जन्मती फिर से पावन गंगा है ।।

दूध पिलाए सर्पों से देखो कितने सुरंगा है,

वेदना आह अथाह से गुंजित आकाशगंगा है ।

बंद करो मातम के सात सुरों को,

पदचाप नृत्य में झूमे नवल अनंगा है ।।


जयचंदों के जग में विप्लव कहीं पर दंगा है,

अपनों से छला है सीना लाल रक्त रंगा है ।

प्रहलाद आह्लादित होगा,

हिरण्याक्ष को अवतार प्रभु नरसिंगा है ।।


धर्मांधता के लालच में मचा हुआ हुड़दंगा है,

धर्म बेचता पाखंड बाजार बीच में अधनंगा है ।

पुण्यकर्म है देशप्रेम,रज-रज में साधु संत सत्संगा है ।।


और मॉं भारती के जयघोष से बजा मृदंगा है,

सतरंगी चुनर में श्रृंगार इंद्रधनुषी सतरंगा है ।

यौवन तीव्र तेज प्रताप से,

लहर-लहर-लहराता शान तिरंगा है ।।
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-गुलशन खम्हारी “प्रद्युम्न”

रायगढ़ (छत्तीसगढ़)6260435428

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