KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

रिक्त हुआ मन का मदिरालय

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रिक्त हुआ मन का मदिरालय

रिक्त हुआ मन का मदिरालय ,
कोई आता जाता नहीं ।
सभी शराबी बने पुजारी ,
प्याला दिल बहलाता नहीं ।।

आज मौन मन होकर बैठा ,
उसी नदी के किनारे पर ।
जिसे देख होती थी बातें ,
इतराते थे सहारे पर ।।
शब्द भाव सब हैं मुरझाए ,
क्यों कोई सहलाता नहीं ।
रिक्त हुआ मन का मदिरालय ,
कोई आता जाता नहीं ।।

ये मेरा दुर्भाग्य समझता ,
मेरी ही नादानी रही ।
पूर्ण हुआ करता मन लेकिन ,
वक्त अधूरी गाथा कही ।।
जो कल तक वादे करता था ,
उसको मैं क्यों भाता नहीं ।
रिक्त हुआ मन का मदिरालय ,
कोई आता जाता नहीं ।।

संकल्पों की सीढ़ी टूटी ,
स्वप्निल महालय चूर हुआ ।
शीश विलग होते काँधे से ,
कितना कौन मजबूर हुआ ।।
प्रेम – गीत होठों से रूठे ,
मंच मंत्र कुछ भाता नहीं ।
रिक्त हुआ मन का मदिरालय ,
कोई आता जाता नहीं ।।

-रामनाथ साहू " ननकी "

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