KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

ऋतु बासंती प्रीत-कुण्डलिया छंद

0 90

ऋतु बासंती प्रीत


आता है ऋतुराज जब,चले प्रीत की रीत।
तरुवर पत्ते दान से, निभे  धरा-तरु  प्रीत।
निभे धरा-तरु प्रीत,विहग चहके मनहरषे।
रीत  प्रीत  मनुहार, घटा बन उमड़े  बरसे।
शर्मा  बाबू लाल, सभी को  मदन सुहाता।
जीव जगत मदमस्त,बसंती मौसम आता।
.                 
भँवरा तो  पागल  हुआ, देख  गुलाबी फूल।
कोयल तितली बावरी, चाह प्रीत, सब भूल।
चाह प्रीत,सब भूल,नारि-नर सब मन महके।
चाहे पुष्प पराग, काम हित खग मृग बहके।
शर्मा  बाबू  लाल, मदन हित हर मन  सँवरा।
विरह-मिलन के गीत, सुने सब गाता भँवरा।
.                 
चाहे भँवरा पुष्परस, मधुमक्खी  मकरंद।
सबकी अपनी चाह है, हे बादल मतिमंद।
हे बादल मतिमंद, बरस मत खारे सागर।
रीत प्रीत की ढूँढ, धरा मरु खाली गागर।
बासंती मन लाल,भरो मत विरहा  आहें।
कर मधुकर सी प्रीत, चकोरी  चंदा  चाहे।


बाबू लाल शर्मा, “बौहरा”
सिकंदरा, दौसा,राजस्थान

Leave A Reply

Your email address will not be published.