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सबला नारी -कुण्डलिया छंद

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सबला नारी -कुण्डलिया छंद

अबला  नारी  को कहे, होता है अपमान।
बल पौरुष की खान ये,सबको दे वरदान।
सबको दे  वरदान, ईश  भी  यह जन्माए।
महा  बली  विद्वान, धीर   नारी  के  जाए।
देश रीति इतिहास,बदलती धरती सबला।
करें आत्मपहचान, नहीं  ये होती अबला।

होती पीड़ा  प्रसव में, छूट सके  ये  प्रान।
जानि  गर्भ धारण करे,नारी सबल महान।
नारी सबल  महान, लहू से  संतति  सींचे।
खान पान सब देय,श्वाँस जो अपने खींचे।
सूखे में शिशु सोय, समझ गीले  में सोती।
ममता सागर नारि, तभी ये सबला  होती।

सबला ममता के लिए,त्याग सके हैं प्रान।
देश धर्म  मर्याद हित, ले भी सकती जान।
ले भी सकती जान,जान इतिहास रचाती।
पढ़लो  पन्ना धाय, और जौहर  जज्बाती।
देती  लेती जान, जान क्यों कहते अबला।
सृष्टि धरा सम्मान,नारि प्राकृत सी सबला।

बाबू लाल शर्मा “बौहरा”
सिकंदरा, दौसा,राजस्थान
विधान- दोहा+रोला

१३११,१३११,१११३,१११३,१११३,१११३

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