साहित्य की आत्मा कविता

साहित्य की आत्मा कविता

छंद मुक्त कविता

काव्य श्रृंगार बिना साहित्य,
बेजान अधूरा सा लगता है ।
रसयुक्त काव्य जन मानस में,
भावों का संचार करता है ।
श्रृंगार,करुणा,वीर,वात्सल्य ही,
साहित्य में प्राण पल्लवित करता है ।
काव्य साहित्य की आत्मा,
काव्य से ही साहित्य सृजता है।

स्वर नाद से गुंजित काव्य,
रोम-रोम पुलकित करता है ।
रामायण, महाभारत जैसे,
महाकाव्य की रचना करता है।
काव्यहीन साहित्य बेजान सा,
रसहीन सृष्टि में नहीं उभरता है ।
शब्दालंकार की रमणीयता,
रसिक अंतर्मन में रस भरता है।

नौ रसायुक्त सृजित काव्य से,
साहित्य की शोभा बढ़ता है।
साहित्य समाज का दर्पण,
राष्ट्र का पथ प्रशस्त करता है।
संस्कृति और सभ्यता हमारी,
साहित्य में सजता संवरता है ।
काव्य साहित्य की आत्मा ,
काव्य से ही साहित्य गूंजता है ।

प्रस्फुटित होते मनोभाव उर के,
काव्य सूत्र में बंधित होता है।
इतिहास का लेखा-जोखा भी,
साहित्य में प्रतिबिंबित होता है।
ह्रदय स्पंदित कर छाप छोड़े,
वह कालजयी काव्य होता है ।
काव्य साहित्य की आत्मा,
साहित्य में परिलक्षित होता है।
रचनाकार
श्रीमती पद्मा साहू *पर्वणी*
खैरागढ़ छत्तीसगढ़

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