सर्द हवाएँ – सुकमोती चौहान रुचि

सर्द हवाएँ – सुकमोती चौहान रुचि


सर्द हवाएँ हृदय समाये, तन मन महका जाये |
आ कानों में कुछ कहती है, मधुरिम भाव जगाये |

हमको तुम कल शाम मिले थे, पसरी थी खामोशी |
भाव अनेकों उमड़ पड़े थे, लब पर थी मदहोशी ||
शांत सुखद मौसम लगता है, मन ये शोर मचाये |
सर्द हवाएँ हृदय समाये, तन मन महका जाये ||

तुमसे मिलकर होश गँवाये, आती कहीं न चैना |
नित्य देखते ख्वाब तुम्हारा, जागे सारी रैना |
नरम नरम कंबल में लिपटे, याद तुम्हारी आये |
सर्द हवाएँ हृदय समाये, तन मन महका जाये ||

धूप सुनहरी बड़ी सजीली, पंछी भरते आँहें |
खड़े रहे थे तुम फैलाये , आलिंगन की बाँहें |
खुली वादियाँ उड़ता आँचल, हरदम तुम्हें बुलाये |
सर्द हवाएँ हृदय समाये, तन मन महका जाये |


सुकमोती चौहान रुचि

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