फ़िल्म समीक्षा : सत्यकाम- हृषिकेश मुखर्जी (1969)

फ़िल्म समीक्षा : सत्यकाम- हृषिकेश मुखर्जी (1969)

आजादी के संघर्ष के दौरान यह सपना देखना स्वभाविक था कि स्वतंत्रता के बाद देश का अपने ढंग,अपनी आकांक्षाओं के अनुरूप पुनर्निर्माण किया जाएगा।कोशिशें हुईं भी। मगर विडंबना कि हर दौर की तरह शासन-प्रशासन का बड़ा हिस्सा उसी ‘व्यावहारिक’ राह पर चला जो भ्रष्टाचार को ‘सहज’ मानता है।यानि सत्ता का हस्तान्तरण तो हुआ चरित्र नहीं बदला।

लेकिन यह ज्यादती होगी यदि यह न कहा जाय कि हर दौर की तरह इस दौर में भी कुछ लोग थे जो सत्यनिष्ठ थे और ईमानदारी से अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे थे और देश को एक नयी दिशा दे रहे थे। ज़ाहिर है ऐसे लोग बहुतों के लिए ‘असुविधाजनक’ होते हैं और किसी भी तरह उन्हें अपनी तरफ खींचने का प्रयास किया जाता है और असफल होने पर उन्हें लांछित करने या ख़त्म करने का प्रयास किया जाता है।

फ़िल्म ‘सत्यकाम’ का सत्यप्रिय इसी तरह का ईमानदार व्यक्ति है।पेशे से इंजीनियर है और कम से कम ख़ुद के माध्यम से भ्रष्टाचार होने नहीं देता न उसमे भागीदार होता है। ज़ाहिर है ऐसे में सामान्य सुविधाओं से जीवन जीता है और उसके समकक्ष पद वाले उससे काफ़ी ‘आगे’ निकल जाते हैं।

मगर सत्यप्रिय को इससे कोई गिला नहीं है,क्योकि यह सत्यवादिता उसके लिए ओढ़ी हुई नहीं है,बल्कि सहज है। इसलिए प्रलोभन के हर अवसर को वह ठोकर मार देता है और बार-बार उसे नौकरी से निकाला भी जाता है।कठोर परिश्रम से एक हद तक उसका शरीर भी कमजोर हो जाता है और अंततः कैंसर की चपेट में आने से उसका असामयिक निधन भी हो जाता है।

सत्यप्रिय को सत्यनिष्ठता का संस्कार परिवार से भी मिला है। उसके दादा सत्यशरण आचार्य जी भी सत्यनिष्ठ हैं, और अपने उसूलों पर कायम रहते हैं।मगर दिक्कत यह है कि ‘सत्य’ की परिभाषा कई बार व्यक्ति अपने परम्परागत संस्कारों के हिसाब से गढ़ लेता है।जो हमारे लिए सच है जरूरी नहीं सब के लिए हो, जरूरी नहीं कि वह व्यापक मानवता के हित मे वैज्ञानिकता से सम्पन्न हो।कहना न होगा यह सत्य के नाम पर भ्रांत सत्य है।

सत्यशरण आचार्य सत्यनिष्ठ हैं,आर्थिक भ्रष्टाचार नहीं करते वहां तक ठीक है,मगर जब वे छुआछूत,रक्त शुद्धता,यौन शुचिता-अशुचिता को सही मानते हैं तो उसे जायज नहीं कहा जा सकता।यह भी मानवता के विरुद्ध भ्रष्टाचार ही है।विडम्बना कि ऐसे लोगों को इसका अहसास होता ही नहीं। अवश्य फ़िल्म में,आख़िर में सत्यशरण जी को इसका भान होता है।

सत्यप्रिय को भी अपने दादा जी से सत्यनिष्ठता और कर्तव्यनिष्ठता के संस्कार मिले हैं, इसलिए वह इंजीनियर बनने के बाद कभी भी न भ्रष्टाचार में संलग्न होता है न अपने माध्यम से होने देता है। वह सहज और मानवतावादी है और अपने दादा से आगे बढ़कर छुआछूत के बंधन को त्याग चुका है मगर स्त्री सम्बन्धी शुचिता और ‘रक्त शुद्धता’ की अवधारणा से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो सका है।

यही कारण है कि वह ‘रंजना’ जो एक ‘वेश्या’ की बेटी है से सहानुभूति रखता है और धीरे-धीरे उससे प्रेम भी करने लगता है,मगर उसके अंदर गहरा अंतर्द्वंद्व है। वह उससे प्रेम करता है,ज़मीदार द्वारा रंजना पर किये जा रहे अत्याचार से खीझता भी है,मगर उससे विवाह करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता,और अन्ततः उसके कशमकश के कारण ज़मीदार रंजना का बालात्कार करने में सफल हो जाता है।

सत्यप्रिय इस ग्लानि से उबरने के लिए रंजना को अपना जीवन साथी बना लेता है मगर अंदर कहीं शुचितावाद बद्ध है जिससे वह मुक्त नहीं हो पा रहा है।यही कारण है कि वह रंजना के बालात्कार जनित सन्तान को तमाम सदिच्छा और प्रेम के बाद भी पूरी तरह ‘अपना’ नहीं मान पा रहा है। रंजना और उसके बीच एक अदृश्य दीवार सी है। ऐसा नहीं कि सत्यप्रिय इसे नहीं जानता। वह जानता है,मगर चाह कर भी उससे मुक्त नहीं हो पा रहा है।

कहना न होगा मूल्यों का यह सामंती अवशेष सत्यप्रिय के संदर्भ में आश्चर्यजनक लगता है,क्योंकि जो व्यक्ति कर्तव्य और मानवता के प्रति इतना संवेदनशील है उसके अंदर इस तरह के पितृसत्तात्मक सामंती मूल्यों बचा रहना उसके व्यक्तित्व के अनुसार नहीं लगता। मगर फ़िल्मकार का प्रयास उसके व्यक्तित्व को ‘मानवीय’ द्वंद्व से युक्त दिखाना जान पड़ता है।

रंजना का चरित्र फ़िल्म में महज ‘निस्सहाय’ स्त्री का है। वह परंपरागत पितृसत्ता की धारा में बह रही है। एक ‘वेश्या’ की संतान होने और दूसरे के पालन-पोषण के ‘अहसान’ से दबी अपनी अस्मिता को भूल चुकी है।उसमे ममत्व है,प्रेम है मगर संघर्ष नहीं है। ज़मीदार के आगे ख़ुद को समर्पित कर देना या विवाह को ही जीवन की चरम उपलब्धि समझना उसके व्यक्तित्व की सीमाएं है।हर जगह वह ऐसे दिखाई पड़ती है मानो पुरुष की छाया के बिना स्त्री का कोई जीवन नहीं है।

अवश्य उसके व्यक्तित्व के निर्माण में उसके दुखद परिवेश और देशकाल की सीमा है और फ़िल्म की केन्द्रीयता भी सत्यप्रिय के चरित्र पर है,इसलिए भी उसके चरित्र को फिल्मकार ने इस ढंग से गढ़ा जान पड़ता है।

फ़िल्म शीर्षक ‘सत्यकाम’ पौराणिक कथा के जबाला और उसके पुत्र सत्यकाम से प्रभावित है।सत्यकाम की माँ जबाला ने उससे कहा थी कि मैंने बहुतों की सेवा करके तुम्हे पाया है इसलिए तुम्हारे पिता का नाम बता पाना मेरे लिए सम्भव नहीं है। यह बात सत्यकाम ने सहजता से गौतम ऋषि को पिता का गोत्र पूछने पर बताया था। गौतम उसके सत्य बोलने के साहस पर प्रसन्न हुए थे।

फ़िल्म में रंजना के पुत्र के जैविक पिता भिन्न है जिसके प्रति प्रेम के बावजूद सत्यप्रिय के अन्तस् में कहीं संकोच है।लेकिन कहा जाता है मृत्यु बहुत से गिले-शिकवे,असत्य,झूठ को खत्म कर देता है। सत्यप्रिय भी मृत्युशय्या पर इससे मुक्त हो जाता है,और उसके पिता सत्यशरण भी अपने पोते के ‘सत्य बोलने के साहस’ निरुत्तर और अपनी जड़ता से मुक्त हो जाते हैं। इस तरह फ़िल्म के आख़िर में रंजना,उसका बेटा और दादाजी सत्यशरण एक साथ नए जीवन की राह में निकल पड़ते हैं जाहिर है वह जीवन सत्यप्रिय के आदर्शों पर ही होगा।

फ़िल्म नारायण सान्याल के बंगाली उपन्यास ‘सत्यकाम’ पर आधारित है।


अजय चन्द्रवंशी, कवर्धा(छत्तीसगढ़)
मो. 9893738320

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