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सौभाग्य पर्व – करवा चौथ

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करवा चौथ

करवा चौथ के व्रत का वह पल , बड़ा सुहाना लगता है ।
जमीं के चांद का आसमान के चांद से मिलने का पल , बड़ा सुहाना लगता है।
पति प्रेम से लिप्त यह व्रत , मन को लुभाना लगता है।
करवा चौथ के व्रत का वह पल , बड़ा सुहाना लगता है।
किए सोलह श्रृंगार नारियां जब छतों में आती हैं ,
चांद को देखने का वह पल , बड़ा सुहाना लगता है।
हाथों में मेहंदी , आंखो पे काजल, गले में हार का दीदार सुहाना लगता है।
नई चूड़ी , नए कंगना , नवीनता का सारा श्रृंगार सुहाना लगता है।
पहन कर चुनरी सतरंगी , पिया को रिझाना लगता है।
कर सोलह श्रृंगार सज कर , पिया के मन को लुभाना लगता है।
कार्तिक की चतुर्थी चांदनी में , मुझे पिया चांद सी बनना लगता है।
निर्जल व्रत रखकर , पिया की उम्र बढ़ाना लगता है।
करवा चौथ के व्रत का वह पल , बड़ा सुहाना लगता है।
आसमान का एक चांद भी शरमा जाता है, जमीं के लाखों चांद को देख कर,
शरमाने की अदा का वह पल बड़ा सुहाना लगता है।
प्रकती भी देती है जमीं के देवियों का साथ,
सर्दी की हल्की बौछार का वह पल, बड़ा सुहाना लगता है।
अखंड सुहाग रहे सभी मां – बहनों का,
खुदा से दुआ दोहराना लगता है ।
करवा चौथ के व्रत का वह पल, बड़ा सुहाना लगता है।।

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