KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

शीत में निर्धन का वस्त्र- अखबार

पद्मा साहू

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शीत में निर्धन का वस्त्र -अखबार

काया काँपे शीत से, ओढ़े तन अखबार।
शीत लहर है चल रही, पड़े ठंड की मार।
पड़े ठंड की मार, नन्हा सा निर्धन बच्चा।
शीत कहाँ दे चैन, नींद से लगता कच्चा।
कहे *पर्वणी* दीन, दीन पर आफत आया।
देख बाल है निरीह, ठंड से कांपे काया।।

मानवता है गर्त में, सिमट गया संसार।
कौन सुने निर्धन व्यथा, कौन बने आधार।
कौन बने आधार, राह पर बच्चा सोया।
सोया खाली पेट, भूख को अपना खोया।
कहे *पर्वणी* दीन, बाल की देख विवशता।
कैसा है संसार, शर्म में है मानवता।।

खोया बचपन राह में, मिला नहीं सुख चैन।
देख दृश्य करुणा भरा, बहे अश्रु है नैन।
बहे अश्रु है नैन, देख कर कागज तन में।।
ऐसा मिला आघात, नहीं है उष्ण बदन में।।
कहे *पर्वणी* दीन, रूठ कर किस्मत सोया।
हृदय बना पाषाण, सड़क पर बचपन खोया।।

पद्मा साहू “पर्वणी” शिक्षिका
जिला राजनांदगांव
खैरागढ़ छत्तीसगढ़