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सहज योग तुम कर लेना-राजेश पाण्डेय *अब्र*

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सहज योग तुम कर लेना

तम की एक अरूप शिला पर
तुमको कुछ गढ़ते जाना है
भाग्य नहीं अब कर्म से अपने
राह में कुछ मढ़ते जाना है,

चरण चूमते जाएँगे सब
तुम कर्म की राह पकड़ लेना
भाग्य प्रबल होता है अक्सर
इस बात को तुम झुठला देना,

संकट काट मिटाकर पीड़ा
लक्ष्य विजय तुम कर लेना
भाग्य नहीं वीरों की कुंजी
सबल कदम तुम धर लेना,

दर्प से क्या हासिल होता है
सहज योग तुम कर लेना
सुस्त नहीं अब पड़ो पहरुए
कर्म सफल तुम कर लेना.

?

✒कलम से
राजेश पाण्डेय अब्र
   अम्बिकापुर
कविता बहार से जुड़ने के लिये धन्यवाद

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