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सिरपुर की कविता

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सिरपुर की कविता

सिरपुर की कविता
सिरपुर की कविता

सिरपुर की है , इतिहास गहरा।
छत्तीसगढ़ की है, ये पावन धरा।
गौरव बढ़ाता लक्ष्मणेश्वर ।
यश फैलाता महादेव गंधेश्वर।
भग्नावशेष है स्वास्तिक विहार के,
जिसमें विराजे गौतम बुद्धेश्वर ।
श्रीपुर है दिव्य स्थल,
जहाँ देवों का पहरा ।
छत्तीसगढ़ की है, ये पावन धरा।1

दक्षिण कोशल की है जो राजधानी ।
पांव पखारे जिसे ,महानद की पानी ।
राम-लक्ष्मण की मंदिर है जहाँ, सुहानी ।
बनाया था जिसे हर्ष की वासटा महारानी ।
शैव,वैष्णव,बौद्ध,जैन धर्म से जुड़ी
यहाँ पर उनकी चिह्न प्रतीकों से भरा।
छत्तीसगढ़ की है, ये पावन धरा।2

दूरस्थ क्षेत्रों से आते चित्रांगदापुर ।
अखिल विश्व धरोहर में, है मशहुर ।
सातवीं शताब्दी में आया जो भूकंप
हो गई फिर यह दिव्य स्थल चूर-चूर ।
कला स्थापत्य धर्म अध्यात्म से पूर्ण
सोमवंशी राजाओं का था यहाँ डेरा।
छत्तीसगढ़ की है, ये पावन धरा।3
(✒ मनीभाई ‘नवरत्न’, छत्तीसगढ़ )

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