KAVITA BAHAR
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समझदार बनो

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समझदार बनो

कहते हैं बड़े बुजुर्ग
समझदार बनो
जब बेटियाँ चहकती हैं
घर के बाहर
खिलखिलाती हैं
उड़ना चाहती हैं
पंख कतर दिये जाते हैं
कहा जाता है
तहजीब सीखो
समझदार बनो !
जब वह बराबरी
करती दिखती भाई की
उसे एहसास
दिलाया जाता है कि
तुम लड़की हो
तुम्हें उड़ने का हक नहीं है
बस बंद रहना है
विचारों के कटघरे में
तुलना न करो तुम
अपने हद में रहो
समझदार बनो !
माना समाज ने
बहुत तरक्की की है
पर कहाँ, कब, कैसे
किसके लिए
वही पुरातन विचार लिए
दोराहे पर खड़े हैं हम
कदम आगे बढ़ते ही
यही कहा जाता है
औकात में रहो
समझदार बनो !
समाज से कहना यही है
अब तो भेद-भाव की
जंजीरें तोड़ो
सपना हर किसी को
देखने का हक है
समानता की बातें करते हो
सच में इसे अपनाओ
समझदार बनो !

अनिता मंदिलवार सपना
अंबिकापुर सरगुजा छतीसगढ़

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