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सृजन-गीत – हरिश्चन्द्र त्रिपाठी ‘हरीश

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सृजन-गीत कब गायेगा – हरिश्चन्द्र त्रिपाठी ‘हरीश

सृजन-गीत
HINDI KAVITA || हिंदी कविता

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कोई बता दे मानवता का ,
परचम कब लहरायेगा,
तहस-नहस को आतुर मानव,
सृजन-गीत कब गायेगा। टेक।

क्षिति-जल-अम्बर नित विकास के,
बन कर साक्ष्य महान हुए,
धरा बधूटी बन मुसकाई,
स्वप्निल सुखद बिहान हुए।
द्वन्द्व-द्वेष ने कब आ घेरा,
मुझको कौन बतायेगा।
कोई बता दे मानवता का ,
परचम कब लहरायेगा।1।

श्मशान पटे हैं लाशों से,
असहाय तड़पती सॉसों से,
कोहराम मचा है जीवन में,
विष घोल रहे परिहासों से।
विश्व युद्ध के शंखनाद से,
आकर कौन बचायेगा ।
कोई बता दे मानवता का,
परचम कब लहरायेगा ।2।

लहूलुहान हुई मर्यादा ,
नियमों का अनदेखापन,
तोड़ रहे समझौते सारे,
चढ़ा घिनौना पागलपन।
बढ़े अहम के सनकीपन से,
दुनिया कौन बचायेगा।
कोई बता दे मानवता का,
परचम कब लहरायेगा।3।

सत्य-न्याय की जीत कराने,
साथ चलो हम चलते हैं,
कटुता की हर बात भूल कर,
राह नई हम चुनते हैं।
जन-जन की आशाओं का,
दीपक कौन जलायेगा।
कोई बता दे मानवता का,
परचम कब लहरायेगा।4।

हरिश्चन्द्र त्रिपाठी ‘हरीश‘,
रायबरेली-(उप्र)-229010
9125908549

अन्य कविता :जीवन पर कविता – सुधा शर्मा

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