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सुकमोती चौहान “रुचि” की 10 रचनाएँ

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सुकमोती चौहान “रुचि” की 10 रचनाएँ

एक अंकुरित पौधा

एक अंकुरित आम , पड़ा था सड़क किनारे ।
आते जाते लोग , सभी थे उसे निहारे ।।
खोज रहा अस्तित्व , उठा ले कोई सज्जन ।
दे दे जड़ को भूमि , लगा दे लेकर उपवन ।।
करता वह चीत्कार है , जीना चाहूँ मैं सुनो ।
मुझे सहारा दो तनिक , कोई तो मुझको चुनो ।।

सुनते नहीं पुकार , हुए क्या मानव बहरे ।
हुई चेतना शून्य , भाव भी हुए न गहरे ।।
बड़ी तेज है धूप , कई दिन से प्यासा हूँ ।
बुद्धिमान इंसान , तुम्हारी ही श्वासा हूँ ।।
मैं आशातित दृष्टि से ,ताक रहा हूँ हे मनुज ।
जीवन दोगे तुम मुझे , या बन जाओगे दनुज ।।

मेरे कोमल पर्ण , लगे हैं अब मुरझाने ।
टूट रही है साँस , मरण जीवन वो जाने ।।
पड़ने लगी दरार , सूखता जीवन रस है ।
अब तो मिले दुलार , टूटता सारा नस है ।।
जब तक अंतिम साँस है , तब तक मुझको आस है ।
मानवता है जिंदा अभी , मन में यह विश्वास है ।।

प्यारा पौधा एक , नर्सरी का हूँ जाया ।
रखती मेरा ख्याल , ध्यान से हर पल आया ।।
शीतल पानी डाल , धूप में मुझे सुलाती ।
पौष्टिक खाना रोज , समय पर मुझे खिलाती ।।
पला बढ़ा हूँ मैं वहाँ , निशदिन लाड़ दुलार से ।
दुःख कभी जाना नहीं , दूर रहा संसार से ।।

मुनगा, बेर, अनार , आँवला नीबू केला ।
भरा पड़ा अंबार , पौध का रेला पेला ।।
पौधा बन तैयार , तभी बिछड़ा माली से ।
यात्रा के दौरान , गिरा मैं उस ट्राली से ।।
जीने को संघर्ष मैं , पल – पल करता हूँ सदा ।
मानवीयता ढूढ़ता , रोज झेलता आपदा ।।

चमक उठी है नैन , किसी ने मुझको देखा ।
शायद अब हो भोर , भाग्य का चमके लेखा ।।
उठा लिया निज हाथ , मुझे गड्ढे में रोपा ।
उसने फिर जलधार ,शीश पर मेरे थोपा ।।
तत्क्षण तब मैं जी उठा , हे जीवन दाता नमन।
देता हूँ मैं ये वचन , जग में लाऊँगा अमन ।।

26 तालाब

भरे लबालब ताल , तैरते बच्चे तट पर ।
तट पर वट का पेड़ , पड़े लट छींटे पट पर ।।
नीलम वर्ण सरोज , खिले सर में अति सुंदर ।
क्रीड़ा करते हंस , मीन उछले जल अंदर ।।
स्वर्णिम किरणें भोर , जल तरंग में झूमती ।
जीवन रेखा गाँव की , ताल किनारे घूमती ।।

पशु पक्षी के झुंड , नित्य पीते जल शीतल ।
ताल किनारे पेड़ , लगाते बरगद पीपल ।।
वट सावित्री  पर्व , नारियाँ पूजन करती ।
शंख घंट की नाद , कर्ण प्रिय सबको लगती ।।
कुछ गिलहरियाँ शाख पर , करती थी अटखेलियाँ ।
पास बेर की शाख पर , चढ़ी हुई थीं बेलियाँ ।।

बच्चे आकर ताल , सीखते हैं तैराकी ।
नित प्रति रविवार , देखिए इसकी झाँकी ।।
मछली रानी पास , उन्हें आकर ललचाती ।
पल में जाती भाग , पकड़ में कभी न आती।।
आश्रय जलचर जीव की , होती ये तालाब है ।
मेंढक मछली सीपियाँ ,पनडूबी नायाब है ।।

खिड़की

खिड़की घर की शान , लगे बिन  गेह अधूरी ।
आये हवा प्रकाश , खिड़कियाँ बहुत जरूरी ।।
आकर खिड़की पास , झाँकते बाहर हम सब ।
खाना हो जब वात , पास बैठे आकर तब ।।
बारिश की बूँदें तको  , खिड़की में आकर अभी ।
धर के प्याली चाय की , खड़े – खड़े पीते सभी ।।

बस मोटर या कार , नहीं मिलता है खाली ।
सभी चाहते नित्य , सीट हो खिड़की वाली ।।
बहता नित्य समीर , बहलता सबका मन है ।
बाहर झाँके लोग , खेत मंदिर या वन है ।।
यात्रा बनता आसान है , खिड़की वाली सीट पर ।
लोग टूट पड़ते वहाँ , जैसे मुर्गी कीट पर ।।

लगा रहे हैं दौड़ , कई यात्री चढ़ने को ।
पाने को अधिकार , सीट कब्जा करने को ।।
कई बार दो लोग , झरोखे पर लड़ते ।
कितना अधिक महत्व , यही वे साबित करते ।।
कै होना भी मान ले ,  इस झगडे़ का इक वजह ।
समझौते कुछ लोग कर , दे देते अपना जगह ।।

इसी झरोखे पास , अनेकों प्रेम कहानी ।
प्रेम मिलन का द्वार , मिले राजा को रानी ।।
सुंदर लड़की देख ,  प्रेम के गाते गाने ।
जब – जब होती बंद , तड़प जाते दीवाने ।।
लहराती पर्दा मखमली , रास्ते की बाधा बने ।
शाम ढले आती है सुंदरी , यहीं झरोखे सामने ।।

गौरैया आ रोज , बैठती है खिड़की पर ।
चीं- चीं – चीं – चीं बोल , फुदकती वह झिड़की पर ।।
पास पेड़ अमरूद , घोंसला से वक ताके  ।
धामन चढ़कर पेड़ , घोंसला अंदर झाँके ।।
सुनते कई कहानियाँ , खिड़की से शुरुवात की ।
बात इशारों की समझ , छुप – छुप कर हालात की ।।

गेह अँधेरा कूप ,नहीं जब खिड़की कोई ।
आये नहीं प्रकाश , शांति उस घर की खोई ।।
वास्तु दोष इक जान , अशुभ माना जाता है ।
मिले बुरे संकेत , घर न मन को भाता है ।।
बनता मुश्किल से निलय , सोच समझ कर कीजिए ।
खिड़की रोशन दान से , घर पवित्र  कर लीजिए ।।

दर्पण

यथार्थता का ज्ञान , सदा करवाता दर्पण ।
खुद का साक्षात्कार , करे खुद को ही अर्पण ।
खुद की हो पहचान , स्वयं से मिलवाता है ।
देख न पाये नेत्र , वही सब  दिखलाता है ।
दर्पण बिन खुद को कभी , मानव कैसे देखता ।
खुद के ही पहचान को , कैसे भला सहेजता ।

नारी का शृंगार , अधूरा बिन दर्पण के ।
रहे अधूरा साज , गीत के बिन अर्पण के ।
बिन काजल के नेत्र , लुभाते कैसे चितवन ।
भौंहें टंकाकार , भेदता कैसे तन मन ।
बिन दर्पण की नारियाँ , जीती कैसी जिंदगी ।
उम्र छुपा पाती नहीं , पचपन सत्तर की लगी ।

बिन दर्पण इक चीज , बहुत अच्छा होता तब।
रूप रंग को छोड़ , गुणों का आदर  कर सब ।
पाते तब ही देख , सखी मन की सुंदरता ।
जो है सत्य यथार्थ , दर्श फिर उसका करता ।
अंतर्मन से देखता , अंतर्मन से सोचता ।
बाह्य  दिखावे से परे , सत्य गुणों को खोजता ।

गणेश वंदना

जय जय देव गणेश , विघ्न हर्ता वंदन ।
लम्बोदर शुभ नाम , शक्ति शंकर नंदन  है ।।
सर्व सगुण की मूर्ति , सिद्धियों के हो मालिक ।
अतुल ज्ञान भंडार , सुमंगल अति चिर कालिक ।।
सबका घमंड दूर कर , करे सत्व का खोज है ।
इनके परम प्रताप से , मिले सदा ही ओज है  ।।

माता आज्ञा धार्य , लड़े अपने पालक से ।
सबके पालन हार , जगत पति संचालक से ।
तेजस्वी था पुत्र , अपरिचित थे त्रिपुरारी ।
माता की पहचान , चरण जाये बलिहारी ।
वचन पूर्ण अपना किया , देखो देकर प्राण वह ।
मातृ शक्ति का मान रख , पाया अद्भुत त्राण वह ।।

मात पिता है तीर्थ , यही सबको समझाये ।
परिक्रमा कर सात , अग्र पूजा वे पाये ।
बुद्धिमान गणराज , बने सबके प्यारे थे ।
अद्वितीय कर काज , बने सबके तारे थे ।।
सृजनकला के विज्ञ श्री , बनो प्रेरणा स्रोत तुम ।
रुचि भी आई है शरण , बनो लेखनी जोत तुम ।।

सरस्वती माता

ज्ञान दायिनी ज्योति , गिरी दुर्गा गायत्री ।
सर्व व्यापिनी मातु , नमः हे माँ स्वर दात्री ।।
मातु शारदा शुभ्र , विमल भावों की देवी ।
सकल चराचर जीव , परम पद वंदन सेवी ।।
जड़ चेतन में संगीत की , देती शक्ति सरस्वती ।
स्वरागिनी माँ पद्मासना , ज्ञान दान दे भारती ।।

वंदन बारंबार , करूँ मैं वीणापाणी ।
दे दो माँ वरदान , मधुर हो मेरी वाणी ।।
ज्ञान दायिनी मातु , ज्ञान का भर दो गागर ।
मैं हूँ बूँद समान , आप करुणा की सागर ।।
निस दिन मैं पूजन करूँ , करना उर में वास माँ ।
माँगू कृपा प्रसाद मैं , देना नव उल्लास माँ ।।

जीवन तुझ पर वार , बनूँ माता आराधक ।
तपो भूमि संसार , काव्य की मैं हूँ साधक ।।
सेवक की है चाह  , बनूँ तेरी पूजारन ।
रचूँ नवल साहित्य , तुम्हारी बनकर चारन ।।
धारदार हो लेखनी , मिले प्रेरणा आपकी ।
दे पाऊँ उपहार मैं , काव्य कुंज की पालकी ।।

श्रृंगार

नौ रस नौ है भाव , पले मानव मन अंदर ।
मधुर भाव श्रृंगार , समाये उर के कंदर ।।
रति स्थायी भाव , भेद दो इसका जानो ।
प्रेमी जब हो साथ , परम् संयोगी मानो ।।
जल वियोग की आग में , प्रेमी जोड़े तड़पते ।
रुचि वियोग श्रृंगार में , मिलने को वे तरसते ।।

मंद-  मंद मुस्कान , गुलाबी होती गालें ।
अल्हड़ सी मद मस्त , हुई हिरनी सी चालें ।।
बिना नशा के झूम , रही बनकर बावरिया ।
प्रेम डगर में साथ , चले गाते साँवरिया ।।
मधुर मिलन की रात है ,रिमझिम सी बरसात है ।
पुलकित कुसुमित गात है , मन में झंझावात है ।।

मधुर मिलन की रात , याद कर रोती विरहन ।
बही अश्रुवन धार , भीगता तकिया सिहरन।।
आँखें सूजी लाल , कपकपाते अधरों पर ।
लेती पिय का नाम , बसा साजन नजरों पर ।।
बेदर्दी मौसम हुए , चिढ़ा रहे हैं अब मुझे ।
प्रेम अगन दिल में जले , नहीं बुझाये ये बुझे ।।

ताली

ताली की आवाज , करे मन को उत्साही ।
बातों की हो पुष्टि , चाह की बने गवाही ।।
प्रभु की कीर्तन भक्ति , नहीं ताली बिन होता ।
आवश्यक यह  काम , सफलता माल पिरोता ।।
ताली कई प्रकार की , स्काउट में बच्चे बजा ।
नियम कायदा सीखते , लेते सदैव वे मजा ।।

करतल ध्वनि संकेत  , बने अच्छा उद्घोषक ।
होते अनेक लाभ , स्वास्थ्य का होता पोषक ।।
रक्त चाप हो ठीक , दर्द होते छूमंतर ।
यह भी है व्यायाम , गुप्त इक मानो  मंतर ।।
गूँज उठी अब तालियाँ , जयकारे के संग में ।
कृष्ण कथा में झूमते ,  रँग राधे के रंग में ।।

शादी का है जश्न ,  लोग गाते कव्वाली ।
गाते सुमधुर गीत ,  ताल में दे सब ताली ।।
जब ताली की बात , किन्नरों को मत भूलें।
नित उत्सव में नाच , सभी मस्ती में झूलें ।।
आमद का जरिया यही , ताली ही औजार है ।
यह किन्नर की खासियत , बने सहज व्यवहार है ।।

एकांत

कभी रहें एकांत , और अपने उर झाँकें ।
कसें कसौटी आज , स्वयं को उसमें आँकें ।।
दर्पण सा एकांत , स्वच्छ छवि दिखलाएगा ।
मिटते हैं मनभेद ,समस्या सुलझाएगा ।।
लेखा जोखा को समझ ,काम करोगे नित्य तब ।
आत्म चेतना से जगे , अंतस का आदित्य तब ।।

संयम जीवन सार , इसे मानव मत खोना ।
यही सफलता द्वार , नहीं उत्तेजित होना ।।
मंगल दायक धीर , सदा देता है शुभ फल ।
ढृढ़ चरित्र पहचान , समस्याओं  का है हल ।।
जीवन रखना संयमित ,  नायक बन उद्दात रे ।
अंतिम हो इतिहास में , बन मानव विख्यात रे ।।

बनकर रहिए सेतु , बढ़ायें सबको आगे ।
करें नित्य सहयोग , देख अपनापन जागे ।।
टाँग खींचना पाप , काम ये कभी न करना ।
रखना भाव उदार , बहे परहित ज्यों झरना ।।
कुछ पल की है जिंदगी , कर ले परोपकार रे ।
अब तो कर ले स्नेह का ,जग में तू व्यापार रे ।।

 वस्त्र

पेशे के अनुरूप , वस्त्र होता निर्धारण ।
परिचय वर्ग विशेष , जानते जिसके कारण ।।
धर्म कर्म पहचान ,वस्त्र करवा देता है ।
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख , समझ सबको लेता है ।।
संस्कृति के अनुरूप ही , पहने सब पोशाक को ।
अपनाकर निज सभ्यता , ऊँचा रखते नाक को ।।

बुने जुलाहा वस्त्र , लिए भावों की माला ।
रंग- रंग के वस्त्र , लाल सादा अरु काला ।।
बुने बड़ा आकार , कल्पना कर मोटे का ।
सुंदर शिशु आकार , बुने कपड़े छोटे का ।।
सबकी इच्छा पूरण करे , निशदिन सोच विचार कर ।
विविध रूप में सबके लिए ,  अम्बर वह तैयार कर ।।

चले यौवना आज , पहनकर छोटे कपड़े ।
फिल्मी चलते चाल , कई होते हैं लफड़े ।।
अंग प्रदर्शन रीत ,  कभी भी ठीक न होता ।
ढककर रखिए देह , भावना पाक पिरोता ।।
पट प्रतीक होता सदा , चारित्रिक निर्माण का ।
वस्त्र बने पहचान रुचि , मन की शुचिता त्राण का ।।

सुकमोती चौहान “रुचि”

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