KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

चाहत को तुम पलकों में छुपाया न करो

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चाहत को तुम पलकों में छुपाया न करो

सुनो न सुनो न ऐसे तड़पाया न करो
पास बुला के दूर को हटाया न करो
आख़िर इतना क्यों इतराते रहते हो
कितनी बार कहा है भाव खाया न करो


गैरों से हंस हंस के तुम क्यों बातें करते हो
इस तरह से मुझको तुम जलाया न करो
कभी कभी चलता है मजबूरी भी होती है
पर रोज़ रोज़ यूँ देर से तुम आया न करो


माना कि लड़ने से मोहब्बत गहरी होती है
पर बिना बात ही बात को बढ़ाया न करो
दिल दुखता है देख के जब अनदेखा करते हो
इस तरह से मुझको तुम सताया न करो


पता है मुझको तुम अपनी मन मर्जी चलाते हो
ज़िद्द में पर अश्क़ों को बहाया न करो
दिल जिगर और जान तोहफा है क़ुदरत का
सब पर इस जागीर को लुटाया न करो


बिना तुम्हारे हम तो रो रो कर मर जाएंगे
कसम तुम्हें है दामन यूँ झटकाया न करो
कर्म भले हों तो रब खुद ब खुद मन जाता है
बस किसी भी दिल को तुम दुखाया न करो

पता है तुमको आँखें सब सच सच कह जाती हैं
‘चाहत’ को तुम पलकों में छुपाया न करो

नेहा चाचरा बहल ‘चाहत’
झाँसी

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