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स्वालंबन पर कविता

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स्वालंबन पर कविता

स्वालंबन है जीवन अवलंबन
बिन स्वावलंब जीवन है बंधन
स्वावलंबन ही है आत्मनिर्भरता
बिन इसके जीवन दीप न जलता।

स्वालंबन जग में पहचान कराता
शिक्षा का सदुपयोग सिखाता
निराशा में भी आशा भरता
ऊसर में भी प्रसून खिलाता।

अपना दीपक स्वयं बनो
स्वालंबन ही है सिखलाता
जीने का दृष्टिकोण बदलना
स्वालंबी है कर दिखलाता।

स्वालंबन है आत्म अवलंबन
आत्म अवलंबन जब आता है
तो आत्मसम्मान जाग जाता है
आत्मावलंबी स्वयं ही सारे अभाव मिटाता है
नहीं ताकता मुँह किसी का
सम्मान की रोटी खाता है।

स्वालंबन की भूख ही जीवन सफल बनाती है
परालंबन का यह कलंक मिटाती  है
स्वालंबन से सुख न मिले तो क्या
स्वात्मा खुशी से तो इठलाती है।

परावलंबी की आत्मा स्वप्न में भी न सुख पाती है
स्वालंबन भले बुरे का भेद मिटाती है
आत्मसम्मान जगता है जब
आत्मा हर्षित हो जाती है।

स्वालंबन का पथ ही सत्य संकल्प है
आत्मसम्मान से जीने का न कोई विकल्प है
स्वालंबन पर न्योछावर कुबेर का खजाना है
स्वालंबन को सबने जीवन रेखा माना है।

स्वालंबन के आनंद का न कोई अंत है
स्वालंबन का सुख दिग दिगंत है
अपना हाथ जगन्नाथ हो कुसुम तो
पतझड़ भी लगता वसंत है।

कुसुम लता पुंडोरा

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