KAVITA BAHAR
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तिल-तिल कर हम जलना सीखें

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तिल-तिल कर हम जलना सीखें


जीवन दीप वर्तिका तन की, स्नेह हृदय में भरना सीखें।
दानवता का तिमिर हटाने, तिल-तिल कर हम जलना सीखें।


अमा निशासी घोर निशा हो, अन्धकारमय दसों दिशा हों।
झंझा के झोंके हों प्रतिपल, फिर भी अविचल चलना सीखें ॥ तिल..


बीहड़ वन चाहे नद – नाले, शैल शृंगार
भी बाधा डालें।
कुश-कंटक-युत पंथ विकट हो, काँटों को हम दलना सीखें॥ तिल

स्नेह-सुधा पी जगती जीती, स्तुति सुमनों से पुलकित होती।
निंदा-गरल पचाकर प्रमुदित, ज्वाला में हम पलना सीखें। तिल..


तिमिर-ग्रस्त मानव बेचारे, स्वार्थ – मोह रजनी से हारे।
प्राण-प्रदीप प्रभा फैलाने, कण-कण कर हम जलना सीखें। तिल..

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