KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

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तिरंगे का सम्मान

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तिरंगे का सम्मान

देशभक्ति का गीत आओ फिर दुहराते हैं
पावन पर्व राष्ट्र का रस्मों रीत निभाते हैं।
स्वतंत्र देश के गणतंत्र दिवस पर फिर से
एक दिन के अवकाश का जश्न मनाते है।


सूट-बूट में अफसर,नेता खादी लहराते हैं
भ्रष्टाचार की कालिख़ खादी में छिपाते है।
नौनिहाल बेहाल भूखे सड़क सो जाते हैं।
भ्रस्टाचारी जेल में बैठ बटर नान उड़ाते हैं।


सरहद पे जवान गोली से नहीं भय खाते हैं
अपने देश के गद्दारों की गाली से घबराते हैं।
राजनीति पर चौपाल पे चर्चा खूब कराते है।
गन्दी है सियासत इसबात पे ठहाके लगाते है


पर इस कचरे को साफ करने से कतराते हैं।
घर आकर टीवी और बीबी से गप्पें लड़ाते हैं।
सच्चाई सिसकती कोने में झूठे राज चलाते है
भ्रस्टाचार के डण्डे में, झंडा तिरंगा फहराते हैं।


तिरंगे को देना है तुझको अब सम्मान अगर
देश का रखना है तुझको जो अभिमान अगर।
आओ मिलकर फिर एक कसम हम खाते हैं।
भय भूख और भ्रस्टाचार को देश से मिटाते है।


जंगे-आज़ादी का गीत फिर एकबार दोहराते हैं।
स्वाधीनता के गणतंत्र का फिर त्यौहार मनाते है।
कट्टरता के जंजीरो से समाज को मुक्त कराते हैं
वन्देमातरम जयहिंद का नारा बुलंद कर जाते है।


भीतर बैठे गद्दारों को अब बेनक़ाब कर जाते हैं
दुश्मन की छाती पर चढ़, राष्ट्रध्वज फहराते हैं।

पंकज भूषण पाठक “प्रियम”

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