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तोड़े हुए रंग-विरंगे फूल:नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

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नरेन्द्र कुमार कुलमित्र: तोड़े हुए रंग-विरंगे फूल

टीप-टीप बरसता पानी
छतरी ओढ़े
सुबह-सुबह चहलकदमी करते
घर से दूर सड़कों तक जा निकला
देखा–
सड़क के किनारे
लगे हैं फूलदार पौधे कई
पौधों पर निकली हैं कलियाँ कई
मग़र कहीं भी
दूर-दूर तक पौधों पर
खिले हुए फूल एक भी नहीं
सहसा नजरें गई
नहाए न धोए
फूल चुन रहे पौधों से
महिला-पुरुष कई-कई
वही जो कहलाते आस्तिक जन
रखे हुए हैं झिल्ली में
तोड़े हुए रंग-विरंगे फूल
देखा मैंने–
कलियाँ थी सहमी-सहमी
पौधे भी थे सहमे-सहमे
याद हो आया तत्क्षण मुझे
अज्ञेय की कविता
“सम्राज्ञी का नैवेद्य दान”
फूलों को डाली से न विलगाना
महाबुद्ध के समक्ष
सम्राज्ञी का रीते हाथ आना
सोचा फिर–
मैले,अपवित्र हाथों से अर्पित
तोड़े हुए निस्तेज फूलों से
भला कैसे प्रसन्न होते होंगे
अक्षर-अखण्ड देव ! प्रभु !!
— नरेन्द्र कुमार कुलमित्र
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