KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

तुम हो मुझसे सुदूर

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तुम हो मुझसे सुदूर

तुम हो मुझसे सुदूर ,पर मन में तेरा सुरूर ।
ओ बेवफा ओ मगरूर ,बन गई हो मेरा गुरुर।
तुम्हें क्या बताएं ,कैसे समझाएं, पास भी तो नहीं हो।
तुम हो अगर खफा तो मनाए पर उदास भी तो नहीं हो।
खत तुम्हें भेजता हूं होके मजबूर ।


तुम भी खत भेजना मेरा प्यार होता हो जो मंजूर ।।
जब सहता हूं मैं जुदाई तुम ही तुम याद आती हो ।
जब सुनता हूं मैं शहनाई  तुम ही तुम मुझको भाती हो।
कहीं देखी  नहीं आंखों में ऐसा नूर ।
मुझमें मिल जाओ ए मेरे हुजूर ।।
तुम  हो मुझसे…

मनीभाई नवरत्न

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