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उमड़ घुमड़ घन घिर सावन के – रमेश शर्मा

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उमड़ घुमड़ घन घिर सावन के


16,12पर यति, प्रति दो पद तुकांत
(सार छंद)
🙏🙏🙏


उमड़ घुमड़ घन घिर सावन के,
नभ से जल बरसाएँ।
तपन हुई शीतल बसुधा की,
सब के मन हरषाएँ ।।

श्याम घटाअम्बर पर छाएँ,
छवि लगती अति प्यारी।
मघा मेघ अमृत बरसाएँ,
मिटे प्रदूषण भारी ।।
धुले गरल कृत्रिम जीवन का,
प्रेम प्रकृति का पाएँ।
उमड़ घुमड़ घन घिर सावन के,
नभ से जल…..(1)

हे घनश्याम मिटा दो तृष्णा,
धरती और गगन की।
बरसाओ घनघोर मेघ जल,
देखो खुशी छगन की।।
करदो पूर्ण मनोरथ जलधर,
चातक प्यास बुझाएँ ।
उमड़ घुमड़ घन घिर सावन के,
नभ से जल……. (2)

मन्द पवन झकझोरे लेती,
चलती है इठलाती।
शीत ताप वर्षा रितु पाकर,
प्रकृति चली मदमाती।।
सावन में घनश्याम पधारो,
गीत खुशी के गाएँ।
उमड़ घुमड़ घन घिर सावन के,
नभ से जल…. (3)
——————————————-
– – – रमेश शर्मा
खण्डार, सवाई माधोपुर, राज.

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