उषाकाल पर कविता

उषाकाल पर कविता

उषा के आगमन से रूठकर
निज तिमिर विभा समेटकर
ह्रदय मुकुल अपना सहेजकर
माधवी निशा कित ओर चली•••

सज सँवर वह दमक-दमक कर
तीखी नयन वह चहक-चहक कर
सुरभि का देखो सौरभ खींच कर
मादक सी चुनर ओढ़ चली•••

मंद-मंद मधु अधरों की लाली
अलसित देह अमि की प्याली
छोड़ विगत घाट पर अलबेली
बहती निर्झर वह चितचोर चली•••

प्राची का सूर्य खड़ा समीप
मृदुल किरणों का लेकर दीप
सहज सरल गुमसुम सरिता सी
अविरल आसव वह खोज चली•••

जीवन का वह संदेश सुनाती
आशा तृषा की बात बताती
स्व के अहं का अवरोध हटाती
नित नई नूतनता की ओर चली••••                     

 नीलम ✍

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