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उतरो उस धरा पर – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

इस रचना में जिन्दगी को बेहतर तरीके से जीने और आदर्श स्थापित करने हेतु प्रेरित करने का प्रयास किया गया है |
उतरो उस धरा पर – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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उतरो उस धरा पर – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

उतरो उस धरा पर
जहां चाँद का बसेरा हो
खिलो फूल बनकर
जहां खुशबुओं का डेरा हो
चमको कुछ इस तरह
जिस तरह तारे चमकें
उतरो उस धरा पर
जहां चाँद का बसेरा हो

न्योछावर उस धरा पर
जहां शहीदों का फेरा हो
उतरो उस धरा पर
जहां सत्कर्म का निवास हो
खिलो उस बाग में
जहां खुशबुओं की आस हो
उतरो उस धरा पर
जहां चाँद का बसेरा हो

बनाओ आदर्शों को सीढ़ी
खिलाओ जीवन पुष्प
राह अग्रसर हो उस ओर
जहां मूल्यों का सवेरा हो
उतरो उस धरा पर
जहां चाँद का बसेरा हो

खिले बचपन खिले यौवन
संस्कारों का ऐसा मेला हो
संस्कृति पुष्पित हो गली- गली
ऐसा हर घर में मेला हो
उतरो उस धरा पर
जहां चाँद का बसेरा हो

प्रकृति का ऐसा यौवन हो
हरियाली सबका जीवन हो
सुनामी, भूकंप, बाढ़ से बचे रहें हम
आओ प्रकृति का श्रृंगार करें हम
उतरो उस धरा पर
जहां चाँद का बसेरा हो

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