उठो स्वदेश के लिए -वंशीधर शुक्ल

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उठो स्वदेश के लिए -वंशीधर शुक्ल


उठो स्वदेश के लिए, बने कराल काल तुम,
उठो स्वदेश के लिए, बने विशाल ढाल तुम!


उठो हिमाद्रि शृंग से, तुम्हें प्रजा पुकारती,
उठो प्रशस्त पन्थ पर, बढ़ो सुबुद्ध भारती!
जगो विराट देश के, तरुण तुम्हें निहारते,
जगो अचल, मचल, विकल, करुण तुम्हें दुलारते ।


बढ़ो नयी जवानियाँ, सर्जी कि शीश झुक गए,
बढ़ो मिली कहानियाँ, कि प्रेम-गीत रुक गए।
चलो कि आज स्वत्व का, समर तुम्हें पुकारता,
चलो कि देश का, सुमन-सुमन निहारता।


जगो, उठो, चलो, बढ़ो, लिये कलम कराल-सी,
डसे जो शत्रु-सैन्य को, उसे तुरन्त व्याल सी!
उठो स्वदेश के लिए, बने कराल काल तुम
उठो स्वदेश के लिए, बने विशाल ढाल तुम।

-वंशीधर शुक्ल

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