KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

सरसी छंद में रचित कविता ‘विघ्न हरो गणराज’-सुधा शर्मा

विघ्न हरो गणराज

हे गौरी नंदन हे गणपति,प्रथम पूज्य  महराज।

कृपा करो हे नाथ हमारे,विघ्न हरें गण राज।।

घना तिमिर है छाया जग में, भटक रहा इंसान।  

भूल गया जीवन मूल्यों को ,बना हुआ शैतान।।

 हे दुख भँजन आनंददाता,करिए  पूरी आस।

रोग दोष सकल दूर करके,हरिए क्लेशविषाद ।।

प्रथम पूजनीय हो प्रभू जी,पूजे सब संसार। 

शुद्धि बुद्धि करिए गणराजा,हरिए सभी विकार।।

दर्प दलन किया था आपने,देकर चंद्रदेव को शाप।

कला हीन होकर तब भगवन,मिला विकट  संताप।

काम क्रोध मद लोभ डूबकर,भूले जो सदचाह।

पथ प्रदर्शक बनें बुद्धि प्रवर,दो विवेक की राह।।

विनती इतनी है  गणनायक,हो शान्ति परिवेश। 

मानवता सदभावना खिले,सदा सुखी हो देश।।

 सुधा शर्मा राजिम छत्तीसगढ़