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विजिया गुप्ता समिधा की कवितायेँ

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यहाँ पर आपको विजिया गुप्ता समिधा की कवितायेँ दिए जा रहे हैं

स्वार्थहीन प्रेम

अलौकिक स्वार्थहीन प्रेम,
आत्मा का आत्मा से मिलन।
सबकुछ मर्यादित और सधा हुआ सा,
राधा कृष्ण हो या कृष्ण राधा।
कोई अंतर नहीं ,सूक्ष्म सा भी नहीं।

प्रकृति भी मौन,मगन ,
इस दिव्य प्रेम को निहारती अपलक।
सबकुछ ठहर सा गया हो जैसे,
बाँसुरी भी इस दिव्यता में
बिना अधरों से लगे भी
मधुर तान छेड़ रही हो जैसे

इतना दिव्य और मर्यादित प्रेम
ना कुछ देने की जरूरत
ना कुछ पाने की इच्छा
निश्चल,निर्विकार,पूर्ण
कहीं कोई अधूरापन नहीं
कोई शिकायत नहीं

खूबसूरत सिंदूरी,सुनहरी आभा,
बिखरी पड़ी है,चहुँओर।
इस दिव्य प्रेम का प्रकाश हो जैसे,
ऐसा दुर्लभ,निर्मल,अलौकिक प्रेम ही,
मनुष्य को देवत्व तक ले जाता है।

किन्तु कान्हा! राधा तो राधा है,
केवल राधा।
राधा बन पाना,इतना आसान नहीं।
———–
विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग -छत्तीसगढ़

आत्मविश्वास

*आत्मविश्वास* से भरा हुआ,
प्राणी जब कुछ ठाने तो।
असम्भव कुछ भी बचता नहीं,
हर कार्य सिद्ध हो जाता है।

इस चराचर जगत में,
मानव मस्तिष्क अकेला है।
सही गलत की समझ जिसे,
स्वविवेकित निर्णय क्षमता।

अपने मन की शक्ति लगाकर,
अपना मकसद पूरा करो।
और कभी जो थको,रुको तो,
नन्ही चींटी को याद करो।

अपने अपने हिस्से का ,
संघर्ष सभी को करना है।
किसका कम किसका ज्यादा,
ये तो नियति का लेखा है।

जो तेरे हिस्से आया है,
मन से उसको स्वीकार करो।
औरों से तुलना,व्यर्थ का चिंतन,
इसमें ना समय बर्बाद करो।
निर्विकार भाव से कर्मपथ पर,
आगे बढ़ो,बढ़ते रहो।
लक्ष्य पे केवल नजर रहे,
अर्जुन को तुम याद करो।

रे मानव उठ अब बहुत हुआ,
ज्ञान चक्षु अब खोल जरा।
घनघोर तिमिर जो छाया है,
उठ आगे बढ़ कर उसे हटा।

*आत्मविश्वास* का अखण्ड दीप,
अपने अंदर जलाए रखना।
सबकुछ सम्भव हो जाएगा,
मन में विश्वास बनाये रखना।
———–
विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग -छत्तीसगढ़

एक दीया

तिमिर का दोष मिट गया
विश्वास का दीप जलाए हम
नव आशा का संचार हुआ
यह जंग विजित कर जाएं हम

एक युग पुरुष के आवाहन पर
पूरा देश जगमगा उठा
अखण्ड एकता का प्रतीक बन
हर आँगन में दीप झिलमिला उठा

अब कैसी भी आँधी आये
आश दीप ना बुझने पाए
अंधकार का सर्वनाश हो
नवप्रकाश की किरणें छाए

——–
विजिया गुप्ता ” समिधा”
दुर्ग-छत्तीसगढ़

प्रार्थना


*प्रार्थना* के शब्द पावन
वीणा की ज्यों तार झंकृत
निष्प्राण में जो प्राण फूंके
*प्रार्थना* में शक्ति वो है

इस चराचर जीव जग में
आज बड़ा विकट समय है
चारों तरफ घनघोर अंधेरा
राह कोई नहीं दिखे है

परमपिता परमात्मा
हे दीनबन्धु हे दयानिधे
कृपा करो और कष्ट हरो
*प्रार्थना* है एक सहारा
विपदा भारी दूर करो

समय बड़ा प्रतिकूल है
जीवन संकट आन पड़ा
त्राहि त्राहि मची हुई है
मन का सम्बल बहुत बड़ा

जान की परवाह न कर
कर्मपथ पर जो डटे हैं
विश्वास उनका अडिग रहे
प्रभु साथ उनका दीजिए

उन *कर्मवीरों* के लिए
इक फर्ज हमारा भी बने
पालन करें निर्देश सभी
हर सम्भव सहयोग करें

क्षमा करें जो भूल हुई है
इस जग का सन्ताप हरें
*मानव* तुम भी सबक लो
अब ऐसी गलती कभी न करें

ये समय भी कट जाएगा
आएगा इक नया सबेरा
कष्ट सारे दूर होंगें
होगा खुशियों का बसेरा
———
विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग -छत्तीसगढ़

कोरोना

*कोरोना* का रोना रोये
रे मूरख इंसान
जीभ स्वाद के चक्कर में
बन बैठा हैवान

मासूम निरीह पशुओं की चीखें
सुनकर के मुसकाया
इतना पत्थर दिल बन बैठा
तुझको रहम ना आया

पड़ा प्रकृति का पलटवार अब
हाहाकार मचा है
गेंहू संग में घुन पिस जाए
ऐसी मिली सजा है

घड़ा पाप का ऐसा फूटा
सारे जग में फैला है
कोई राह नजर ना आये
चारों ओर अंधेरा है

अब तो चेतो आँखे खोलो
मांसाहार हटाओ
सबकुछ सम्भल जाएगा प्यारे
शाकाहार अपनाओ

आन पड़ी है विपदा भारी
मानव जाति संकट में
एकजुट हो मिलकर के सब
इस विपदा से लड़ना है

और नही अब बढ़े समस्या
इसका कोई निदान चुनो
कितना विकट समय है समझो
औरों को समझाओ

शासन के निर्देशों को समझो
पूर्णतः पालन करवाओ
सावधानी है सबसे जरूरी
इससे ना कतराओ
——–
विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग -छत्तीसगढ़

बेटी का दर्द



*बेटी का दर्द* वो क्या जाने,
जिनकी सोच घिनौनी है।
क्रूर दृष्टि ये कैसे देखे,
मृगनयनी सी छौनी है।

कितना दर्द सहा बेटी ने,
कोई और ये क्या जाने।
जिसके ऊपर बीती है,
ये तो बस वो ही जाने।

ये सिक्के का एक ही पहलू,
दूसरा भी एक हिस्सा है।
किसने कैसा दर्द सहा ये,
अपना अपना किस्सा है।

अपने स्वार्थ सिद्धि की खातिर,
कुछ बेटियां ये करती हैं।
सीधे-सादे निर्दोषों को,
अपने जाल में कसती हैं।

आधुनिकता की अंधी दौड़ में,
सारे संस्कार ताक में रखकर।
सारा दोष औरों के ऊपर,
मढ़ देना भी सही नहीं।

इन सबके कारण भी,
कानून व्यवस्था ढीली है।
निर्दोष ना दोषी सिद्ध हो जाए,
इसलिए ये इतनी लचीली है।

लेकिन ये भी सच है,
*बेटियों का दर्द* अपरिमित है।
अत्याचार की पराकाष्ठा के,
ढेरों किस्से चर्चित हैं।

बहुत हुआ अब और नहीं,
दर्द और आँसू की बातें।
बेटी तुम नारायणी हो,
खोल दो मन की सारी गांठे।

फौलाद बनो और आगे बढ़ो,
अपना रस्ता आप चुनो।
जीवन संघर्षों का मेला है,
पार करो और बढ़े चलो।

बेटी होना अभिशाप नहीं,
दुनिया को ये दिखाना होगा।
*स्वयमसिद्धा* बनो बेटी,
बिटिया को ये सिखाना होगा।
———

विजिया गुप्ता “समिधा”

रिश्ते

कुछ अनमोल रिश्ते,
जाने-पहचाने से।
कुछ अनमोल रिश्ते,
अनजाने-बेगाने से।

रिश्तों की परिभाषा में,
जाने कितनी बातें हैं।
जागी-जागी बीती जो,
अनगिनत वो रातें हैं।

रिश्ता माँ का बच्चों से,
इक अनमोल खजाना है।
अपनी सेवा की गर्माहट से,
अब उनके सपने सजाना है।

इक रिश्ता है भाई-बहन का,
प्यार भरा,मनुहार भरा।
इक रिश्ता है सहपाठी का,
मीठी-मीठी तकरार भरा।

इक रिश्ता होता है प्यारे,
इंसानों का इंसान से।
भूला बैठी है दुनिया जिसे,
साम्प्रदायिकता के शैतान से।

गुरु शिष्य का रिश्ता भी,
बड़ा अमोलक होता है।
भक्त और भगवान का रिश्ता,
सबसे ऊपर होता है।

आनेवाली पीढ़ी को भी,
रिश्तों का मोल समझना है।
थोड़ा झुक कर,थोड़ा रुक कर,
इक इक मोती पिरोना है।

बन्ध जाएंगे करें जतन तो,
मजबूत डोर में सब रिश्ते।
जीवन सुरभित हो जाएगा,
शीतल-शीतल चन्दन से

चलो सहेजें इन्हें प्यार से,
कुछ भूलें,कुछ याद रखें।
कहीं मौन और कहीं मुखर हो,
निभते और निभाते चलें।

———
विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग-छत्तीसगढ़

संविधान जरूरी है,

जीवन में भी,देश की तरह।

हर व्यक्ति को अपने लिए,
निर्धारित कर,लागू करना चाहिए
एक संविधान।
और पालन करना चाहिए,
पूरी तरह।
अधिकार,कर्तव्य के अलावा,
व्यक्तिगत चरित्र निर्माण के,
कुछ बिंदु भी शामिल हों जिसमें।

निष्पक्ष समीक्षा स्वयं की,
करते रहना चाहिए लगातार,
अनवरत।
देना चाहिये स्वयम को दण्ड,
पालन नहीं होने पर।

कुछ नियम कठोर,कुछ लचीले।
बिल्कुल हमारे देश के सविधान की तरह।
किंतु कोई भी नियम इतना लचीला
कभी ना हो कि,
उस नियम का मजाक बन के रह जाए।

यदि ऐसा सम्भव हुआ तो,
निखर उठेगा।
हर व्यक्ति का व्यक्तित्व।
स्वयम मर्यादित,स्वयम संचालित।
अपने खुद के नियम,
खुद के दण्ड विधान,
सारी समस्याएं ही खत्म।

वैसे भी एक विद्वान का कथन है
*अपनेआप पर अपना लगाया अंकुश लाभकारी होता है*

——-
विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग-छत्तीसगढ़

नरपिशाच


नोंच लो आंखें,
उन *नरपिशाचों* की।
हवस का वहसी पना,
जिन आंखों में हो।
तोड़ दो वह हाथ,
जो खीँचे किसी का आँचल।
आने वाली पीढ़ी को,
सौगात ऐसी दो।
मासूमियत को तार तार,
कर खुले में घूमते जो।
ऐसी मर्द जात को,
नामर्द बना के छोड़ दो।
ऐसा एक कानून बने,
जिसका कोई तोड़ ना हो।
*इस गुनाह* के दोषी को,
लाभ उम्र का नहीं मिले।
और सजा ऐसी मिले कि,
रूह तक झनझना उठे।
बहुत हुआ अब बन्द करो,
सुनवाई का दौर यहीं पर।
पीड़ित के परिवार जनों को,
गुनहगार को सौंप दो।
दें सजा वे लोग उन्हें,
जिन्होंने ज़िल्लत झेली है।
पहला हक ये उनका है,
जो दोषरहित और पीड़ित है।
केवल संवेदना प्रेषित कर,
जो अपना फर्ज निभाते है।
मत स्वीकारो जनता उनको,
वे केवल बात बनाते हैं।
अपना हाथ जला हो जब तो,
दवा स्वयं करनी होगी।
बहुत हुए वादे और दावे,
अब *मशाल* स्वयं बननी होगी।
आज अभी और इसी वक्त,
उठ *रणचंडी* तुम बन जाओ।
चुन-चुन कर संहार करो,
*रक्तबीज* को मार भगाओ।
ऐसा दूषित रक्त जहाँ हो,
अपनी खप्पर लेकर जाओ।
एक बूँद भी बच ना पाए,
चुन-चुन इक-इक बूँद जलाओ।

विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग-छत्तीसगढ़

भारत


भारत ऐसा देश जहाँ,
कदम कदम में विविधता।
अनेकता में एकता,
ये है इसकी विशेषता।

हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,ईसाई,
मिलजुल कर सब रहते हैं।
इक दूजे के सुख दुख को,
मिलकर साझा करते हैं।

कुछ आग लगाने वालों ने
कुछ दूषित सियासी चालों ने।
फूट डालकर तोड़ दिया,
नेह का रस्ता मोड़ दिया।

आपस में सब भाई भाई,
ये हमारा नारा है।
पीठ में खंजर घोंपे जो,
ये कैसा *भाईचारा* है।

पलटवार के चक्कर में,
कितने नरसंहार हुए।
खून से धरती लाल हुई,
भारत माँ चीत्कार उठी।

ये सब देख के मन मेरा,
आक्रोशित,द्रवित हो जाता है।
और एक घटना जिससे,
मन मेरा गर्वित हो जाता है।

तीर्थस्थान में आया जब,
विध्वंसक सैलाब।
इक मुस्लिम भाई ने,
थामा हिंदुओं का हाथ।

महका-महका गुलशन हो,
मेरा प्यारा हिंदुस्तान।
हर कली खिले और मुस्काये,
हनित ना हो उसका सम्मान।

मान रखें इस *भाईचारे* का,
गरिमा इसकी बनी रहे।
जाति,धर्म से ऊपर उठकर,
स्नेह की बगिया सजी रहे।
————

दुर्ग-छत्तीसगढ़

हर किसी की जिंदगी में

हर किसी की जिंदगी में होती है,
कुछ टूटते सपनों की कसक।
सब अरमान सभी के,
कभी पूरे नहीं होते।
नन्ही किलकारी की आवाज से पहले,
माँ बुनने लगती है,रंग बिरंगे धागों से,
अरमान भरे मोजे।
लेकिन कभी-कभी,
अधूरे रह जाते हैं,
उन रंगों में बसे सपने।
बची रह जाती है एक कसक 
भीगी पलकों के साथ


एक नववधू सजाती है सपने,
सदासुहागन,
मृत्युशैया तक जाने के।
किन्तु कभी कभी,
काल की क्रूर दृष्टि के आगे।
टूट कर बिखर जाते हैं उसके सपने,
और वह खुद भी।


एक नन्ही परी,
उड़ना चाहती है,खुले आसमान में
उन्मुक्त,स्वतन्त्र।
पूरे करना चाहती है अपने सपने।
किन्तु कभी कभी,
कुछ पशुतुल्य मनुष्यों के द्वारा,
नोंच लिए जाते है उसके पँख।
टूटकर बिखर जाते है,
उसके सारे सपने
जीना ही भूल जाती है वो,
जिंदा लाश की तरह।


बड़े अरमान से पालते हैं,
माँ-बाप अपने बच्चों को।
एक-एक कदम चलना सिखाते हैं,
उँगली पकड़कर।
वही बच्चे छोड़कर चले जाते हैं,
अपने मां – बाप को वृद्धाआश्रम में
उनके टूटे,बिखरे सपनों के साथ।


बड़े अरमान से किसान,
बोता है अपने खेत में फसल।
चलाता है हल,
सींचता है अपने पसीने से।
एक एक पौधे की देखभाल,
करता है अपने बच्चे की तरह।
लेकिन अक्सर धरे रह जाते हैं,
उसके सारे अरमान।
टूट जाते हैं उसके सपने
जो उसने एक एक पौधे पर
सँजोये थे,
और मजबूर हो जाता है,
वह किसान खुदकुशी के लिए।


हर किसी की जिंदगी में होती है,
कुछ टूटते सपनों की कसक…..


————-
विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग-छत्तीसगढ़

बचपन

संगमरमर की तरह,
कोमल और बेदाग़ होता है,
बचपन।
मनचाहे रूप में,
तराशा जा सकता है उसे।
सहज होता है,
एक सार्थक स्वरूप देना,
यदि मूर्तिकार सशक्त हो।


फूल की तरह नाज़ुक,
होता है बचपन।
बड़े जतन से सहेजता है,
माली जिसे।
बिखरने और मुरझाने नहीं देता,
किसी भी कीमत पर।


कुम्हार के चाक पर,
गीली मिट्टी के ढेले जैसा।
होता है बचपन।
जैसे चाहें,गढ़ सकते हैं उसे।


किन्तु,संगमरमर का 
कोई टुकड़ा
कैसे आकार पाए,
बिना मूर्तिकार के।


कोई फूल कैसे बचे,
मुरझाने और बिखरने से,
बिना माली के।


कोई मिट्टी का ढेर,
कैसे गढ़े अपना रूप,
बिना कुम्हार के।


ऐसे ही कुछ फूलों के लिए,
चलो माली बन जाएं हम।
सवारें उनकी जिंदगी,
एक मूर्तिकार की तरह।
और गढ़ें उनके चरित्र को,
एक कुम्हार की तरह।
———
विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग-छत्तीसगढ़

प्रदूषण की समस्या

शुद्ध वायु दुर्लभ हुई,
प्राणवायु की किल्लत है।
प्रदूषित हो गया नदियों का जल,
देवभूमि में ज़िल्लत है।


खाना दूषित,पानी दूषित,
देवालय भी नहीं बचे।
हाहाकार मचा दुनिया में,
ज़र्रा-ज़र्रा प्रदूषित है।


विकराल समस्या प्रदूषण की,
सुरसा सा मुँह फाड़े है।
निगल जाएगी भावी पीढ़ी,
अब भी गर हम अड़े रहे।


पूर्वजों ने इस समस्या को,
बरसों पहले पहचाना था।
आँगन में हो वृक्ष नीम का,
हर घर ने यह ठाना था।


एक पावन तुलसी का बिरवा,
हर अँगना में होता था।
अतिथि हो या गृहस्वामी,
बाहर पैरों को धोता था।


रोज सुबह उठ द्वार झाड़कर,
गोबर पानी सींचा जाए।
कचरा सकेल घुरूवा में डालो,
खाद बने,उर्वरता लाये।


भूल गए हम सारी व्यवस्था,
आधुनिकता की हलचल में।
झोंक दिया पूरी दुनिया को,
घोर प्रदूषण के दलदल में।


अब भी सम्भल सकते है साथी,
देर से ही पर जागो तो।
एकजुटता दिखलाओ सब,
प्लास्टिक को त्यागो तो।


जितना सम्भव पेड़ लगाओ,
नदियों में ना कचरा बहाओ।
जतन करो और पानी बचाओ,
सच कहने से ना घबराओ।


एक निवेदन है सबसे,
ज़रा पलटकर देखो पीछे।
भावी पीढ़ी तर जाएगी,
आज अगर हम आँख ना मीचे।
———-
विजिया गुप्ता”समिधा”
दुर्ग-छत्तीसगढ़

मेरे आँसू

मेरे आँसू 
पारिजात के फूलो की तरह
खूबसूरत और नाजुक
जो टपकते है सारी रात
अनवरत लगातार
भोर होते ही छा जाते है
होठों पर मुस्कान बनकर

बिछ जाती है  मनमोहक
सिंदूरी चादर  की तरह
मेरे होठों पर
और समेट लेती है पूरे दिन की 
जिम्मेदारियों को अपने अंदर
बिना थके बिना रुके 
अनवरत खिली खिली मुस्कान

शाम ढले देर रात 
फिर खिलते है फूल पारिजात के
खूबसूरत और नाजुक
जो टपकते है सारी रात
अनवरत लगातार……

विजिया गुप्ता “समिधा”

रोज़गार ही तो है

शाब्दिक और प्रचलित अर्थ में, 
केवल आजीविका का साधन
धनोपार्जन का माध्यम मात्र है-
“रोज़गार”। 
किन्तु ब्रम्हांड के 
विभिन्न मापदण्डों में, 
तौला जाए तो
रोजी-रोटी और आजीविका से ऊपर
वृहत अर्थ लिए हुए, 
मज़बूत और वज़नदार शब्द;
रोज़गार जरूरी है 
सभी के लिए। 
इन्सान हो या जानवर
पेड़-पौधे हों या पशु-पक्षी
नदी-पहाड़-मैदान 
सभी के लिए, 
ज़रूरी होता है रोज़गार । 
जीवंत ,महत्वपूर्ण और सार्थक
बने रहने की
अनिरुद्ध आवश्यकता है 
रोज़गार। 
जंगली जानवरों का ,
शिकार की तलाश में
दूर तलक जाना 
रोज़गार ही तो है। 
नन्ही चिड़ियों का 
तिनका-तिनका जोड़कर
घोंसला बनाना ,
दाने लाकर अपने बच्चों को खिलाना
क्या उनके हिस्से का रोज़गार नहीं ?
नदी का निरंतर बहते रहना
पहाड़ों में उपजी औषधि,
मैदानों की फसलें
पेड़ पौधों का प्रकाश संश्लेषण भी
उनके हिस्से का रोज़गार ही तो है। 
नवजात शिशु का स्तनपान
विद्यार्थियों का अध्ययन
गृहणियों का गृहकार्य
बुजुर्गों की सलाह,आशीर्वाद
सब उनके अपने-अपने स्तर का
रोज़गार ही है,
क्योंकि
मेरी नजऱ में रोज़गार साधन है
आदान और प्रदान का
निरन्तर सार्थक कर्म करते रहने का
चलते-चलते 
और एक बात
प्रकृति में कहीं कोई आरक्षण नही
यह तो केवल इंसानों से इंसानों के बीच
क़ायम है एक निकृष्ट रोज़गार की तरह…..

विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग- छत्तीसगढ़

कदम मिला हर कोई चले

स्वच्छ हृदय के गलियारे में
सुंदर स्वच्छ विचार पले
स्वच्छ भारत का सपना लेकर
कदम मिला हर कोई चले

अपने घर से शुरू करें और 
गली मुहल्ले तक फैलाएं
साफ स्वच्छ परिवेश रखें
बीमारी को दूर भगाएं

बरसों पहले गाँधी जी ने
यह अभियान चलाया था
पाखाना खुद साफ करें
सबको यह समझाया था

कथित सभ्य कहलाने वाले
लोगों ने जिन्हें अछूत कहा
उनके साथ खड़े होकर
जनता को यह सन्देश दिया

साफ सफाई करता है जो 
देवतुल्य वह होता है 
हमारे द्वारा फैली गन्दगी को
अपने हाथों से धोता है

पर्यावरण प्रदूषण दिखता
तन मन को पहचाने कौन
तन मन आज प्रदूषित है 
इसकी दशा सुधारे कौन

आओ मिल संकल्प करें
सब स्वच्छता अपनाएंगे
घर से गली मोहल्ले तक
यह अभियान चलाएंगे

गली मोहल्ले से विस्तारित
राज्य देश तक फैलाएं
नदियों का जल भी निर्मल हो
ऐसा इक अभियान चलायें

हर खुशी हर ग़म के मौके पर
निश्चित ही इक पौधा रोपें
आनेवाली पीढ़ी को
ऐसी एक धरोहर सौपें

हर व्यक्ति अधिकार समझ 
यदि इस अभियान से जुड़ जाए
शुद्ध जल और स्वच्छ वायु का

यह सपना सच हो जाए

विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग छत्तीसगढ़

साम्प्रदायिकता

आज की ज्वलन्त समस्या,
साम्प्रदायिक दंगे।
धर्म के नाम पर,
हो रही मार-काट,
और जिहाद।
जिसे धर्मयुद्ध का नाम,
दे रहे हैं लोग।
काश! ये समझ पाते की,
रामायण,गीता,कुरान
बाइबिलऔर गुरुग्रंथ।
और भी अनगिनत
धर्मग्रंथ।
एक ही कागज़ पर
छपे,सारे के सारे
लगभग एक जैसी
शिक्षा देते,
सन्मार्ग पर चलना सिखाते।
और हम,धर्म के ठेकेदार,
भूलकर उन शिक्षाओं को।
आपस में ही लड़ते,खपते
संस्कारों की धज्जियां उड़ाना,
अपनी शान समझते हैं।
मुझे लगता है।
चाहे हम किसी भी धर्म के हों।
अगर हम सब,
सिर्फ अपने-अपने 
पूज्य ग्रंथ का।
पूरी सूक्ष्मता से,गहराई से
अध्ययन करें। 
उसमें दिए उपदेशों को,
आत्मसात करें।
किसी भी अन्य धर्मग्रंथ की 
आलोचना किये बिना।
तो साम्प्रदायिकता
जड़ से ख़त्म हो सकती है।
विश्व शांति सदभाव का,
सपना साकार हो सकता है
किन्तु शुरुआत,
अपने घर से करनी होगी।
बिना किसी तर्क के
मार्ग दुष्कर है, असम्भव नहीं।

विजिया गुप्ता “समिधा’
दुर्ग-छत्तीसगढ़

मैं हूँ ना

मेरी साँसों में बसे हो तुम,
प्राणवायु की तरह।
हृदय के स्पंदन में,
मधुर संगीत की तरह।

सुबह की पहली किरण से,
रात के अंतिम चरण तक।
केवल,तुम ही तुम हो।

तुम्हारे घर की देहरी,
आज भी मेरी लक्ष्मण रेखा है।
तुमसे जुड़े रिश्ते आज भी,
सबसे ऊपर है।

अशेष विषमताओं के बाद भी,
खिली खिली रहती हूँ।
हर जिम्मेदारी,
पूरी ईमानदारी से निभाती हूँ।

फिर क्यों? 
सबकी नज़रों में खटकता है,
मेरा बन सँवर कर रहना।
हँसना खिलखिलाना

तुम्हीं बताओ! 
सफेद साड़ी में लिपटी,
डरी सहमी बेजान सी 
बनी रहती यदि मै।

तो क्या यही स्वरूप,
मेरे मर्यादित चरित्र का
हस्ताक्षरित प्रमाणपत्र होता?

घुट-घुट कर मर जाती मैं।
अतीत के पन्नो में
दबकर रह जाती,
सूखे ग़ुलाब की तरह।

क्या  निभा पाती?
तुम्हारी अधूरी जिम्मेदारियों को,
पूरी तरह।

कौन रखता ?
तुम्हारे अबोध बच्चों के
सिर पर हाथ 
और कहता अनाथ नहीं हो तुम

मैं हूँ ना“। 

विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग छत्तीसगढ़

गइया की पुकार

गइया मईया करे पुकार,
बन्द करो अब अत्याचार।
स्वारथ का है ये संसार,
भटके गइया द्वार-द्वार।

दूध -दही जब मिले अपार,
तब करते हैं साज-सम्भार।
बन्द करे जब देना दूध,
तब देते हैं घर से निकार।

गौ हत्या को बन्द करो,
ऐसा शोर मचाते हैं।
लावारिस सा छोड़ उसे,
खुद मरघट तक पहुंचाते हैं।

ऐसा नियम बना सरकार,
मालिक काँपे थर-थर यार।
जिसकी गइया हो मझधार,
छीन लें उसका कारोबार।

दुर्घटनाएं थम जाएंगी,
आवागमन सुरक्षित होगा।
नहीं भूख से गाय मरेगी,
पर्यावरण भी रक्षित होगा।

जब भी कोई पाले गाय,
पूरी जिम्मेदारी निभाये।
और अगर ये ना कर पाए,
सज़ा के लिये तैयार हो जाए।

विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग-छत्तीसगढ़

मुझको तुम याद आये

खेतों में जब सरसों फूली,

परसा के दिन आये।
फागुन ने जब दस्तक दी तो,
मुझको तुम याद आये।

लगा चैत्र जब,ज्योत जले,
नववर्ष मनाने लोग चले।
वैसाखी की धूम मची तो,
मुझको तुम याद आये।

जेठ माह की तपती दोपहरी,
असाढ़ में गुरुपूर्णिमा आये।
सावन की जब झड़ी लगी तो,
मुझको तुम याद आये।

भादों आया तीज पर्व ले,
और गजानन घर-घर पूजे।
क्वांर माह जब माता विराजी,
मुझको तुम याद आये।

कार्तिक में फिर आयी दीवाली,
अगहन माता लक्ष्मी पधारीं।
रात पूस की जब ठिठुराई,
मुझको तुम याद आये।

आया माघ फिर सरसों फूली,
परसा के दिन आये।
फागुन ने जब दस्तक दी तो,

मुझको तुम याद आये।

विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग-छत्तीसगढ़

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