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विनोद सिल्ला “कैसी दीवाली” दीवाली पर्व का अलग कविता

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दीवाली पर्व का अलग कविता

कैसी दीवाली किसकी दीवाली
जेब भी खाली बैंक भी खाली

हर तरफ हुआ है धूंआ-धूंआ
पर्यावरण भी दूषित है हुआ

जीव-जन्तु और पशु-पखेर
आतिशी दहशत में हुए ढेर

कितनों के ही घर बार जले
निकला दीवाला हाथ मले

अस्थमा रोगी तड़प रहे हैं
उन्मादी अमन हड़प रहे हैं

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नकली मावा, नकली पनीर
खाई मिठाई हो कर अधीर

लूट-खसोट को सजा बाजार
जहाँ लूटते हैं बिना हथियार

हर चौक पर हैं टूने-टपूने
अंधविश्वास. पाखंड हुए दूने

सिल्ला कैसा बढ़ा उन्माद
लड़ी पटाखे घातक उत्पाद

कैसी दीवाली किसकी दीवाली
जेब भी खाली बैंक भी खाली

-विनोद सिल्ला

कविता बहार से जुड़ने के लिये धन्यवाद

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