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विश्व बाल मजदूरी निषेध दिवस पर कविता

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विश्व बाल मजदूरी निषेध दिवस पर कविता

उमर जब खेलने की थी खिलौनों से।
वो सोचने लगा,पेट कैसे भरेगा निबालों से।

भाग्य से किश्मत से, होकर के मजबूर।
अबोध बालक ही, बन जाते हैं मजदूर।

पेट की भूख, इनको मजबूर बनाती।
कड़की ठंड में भी, जीना सिखाती।

उठे जब भाव दर्द, अश्रु ही वो बहाते।
बिन पोछे, स्वयं सूर्यदेव कभी सुखाते।

उमर भी रही कम, जब बनाने थे थाट।
छोड़ गुरुर,सहनी पड़ती मालिक की डांट।

कहीं चाय बेचे, अखबार भी कहीं पर।
जब क्षीण हो शक्ति, रो बैठे जमीं पर।

मृदुल हाथों से वह हथियार चलाता।
मात पितु का जब साया उठ जाता।

कथनी व करनी बाल मजदूरी पर ऐसी।
समाज में लगती सेमल फूल जैसी।

निरर्थक हो जाती हैं बाल योजनाएं।
जब नन्हा दुलारा मजदूरी कमाए।

माना किश्मत ने किया है,उसके साथ धोखा।
मगर सभ्य समाज ने, उसे क्यूँ नहीं रोका।

दे देता कलम और, किताब उसके हाथों में।
किश्मत बदल सकती, उसकी जज्बातों में।

आओ इनकी बेवशी को, खुशियों से झोंक दें।
चलों यारों अब तो, बाल मजदूरी को रोक दें।

अशोक शर्मा, लक्ष्मीगंज, कुशीनगर,उ.प्र.

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