KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

विश्व बचत दिवस: “मितव्ययता कंजूसी नही,समझ लो सब ये बात।”इस भाव को बताती विजिया गुप्ता समिधा की बेहतरीन कविता

*पैसों की बचत* 
पैसे की है बचत जरूरी,
सुन लो सब यह बात।
पहले थी जो,भाग व्यवस्था,
वह इसका प्रतिसाद।
एक रुपये यदि,अपनी कमाई,
चार भाग हो जाते थे।
पहला बुजुर्ग,दूजा दान,
तीसरा हिस्सा था वर्तमान,
चौथा हिस्सा रखो सम्भाल,
उसे भविष्य की अमानत जान।
आज समय है,क्रेडिट कार्ड का,
कर्जे में हर इक इंसान।
फाइनेंस करा के मजे करे,
और बघारे,झूठी शान।
एक दूजे की देखा देखी,
भेड़ चाल सब चलते हैं।
किस्तों में उधार की
खुशियाँ पाकर,
खूब दिखावा करते हैं।
आमदनी अठन्नी,खर्चा रुपइया,
ये भी एक कहावत है।
ऐसा कभी ना करना भैया,
वरना बड़ी फ़जीहत है।
एक कहावत सुन लो भईया,
अल्प बचत का है पर्याय।
बूँद-बूँद जब जमा करो तो,
मटका पूरा भरता जाए।
एक-एक जब ईंट जुड़े तो,
घर पूरा बन जाता है।
एक-एक सिक्का डालो तो,
गुल्लक पूरा भर जाता है।
मितव्ययता कंजूसी नही,
समझ लो सब ये बात।
जितनी लम्बी चादर हो,
उतना ही फैलाओ  पाँव।
सोच समझ कर खर्च करें,
और कर्जे से बचे रहें।
अपना भविष्य सुरक्षित रखें,
बच्चों को भी यही कहें।
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विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग-छत्तीसगढ़

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